महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयावद् वत्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत ।। ७२ ।। फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे । चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति ।। ७३ ।। राजन्! यह मेरी दी हुई ताँबेकी बटलोई लो। सुव्रत! तुम्हारे रसोईघरमें इस पात्रद्वारा फल, मूल, भोजन करनेके योग्य अन्य पदार्थ तथा साग आदि जो चार प्रकारकी भोजन-सामग्री तैयार होगी, वह तबतक अक्षय बनी रहेगी, जबतक द्रौपदी स्वयं भोजन न करके परोसती रहेगी ।। ७२-७३ ।। इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि । आजसे चौदहवें वर्षमें तुम अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लोगे ।। ७३ ½ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ।। ७४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! इतना कहकर भगवान् सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये ।। ७४ ।। इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन् । तत् तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्नुयाद् यद्यपि तत् सुदुर्लभम् ।। ७५ ।। जो कोई अन्य पुरुष भी मनको संयममें रखकर चित्तवृत्तियोंको एकाग्र करके इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह यदि कोई अत्यन्त दुर्लभ वर भी माँगे तो भगवान् सूर्य उसकी उस मनोवांछित वस्तुको दे सकते हैं ।। ७५ ।। यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः । पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् । विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोऽप्यथवा स्त्रियः ।। ७६ ।। जो प्रतिदिन इस स्तोत्रको धारण करता अथवा बार-बार सुनता है, वह यदि पुत्रार्थी हो तो पुत्र पाता है, धन चाहता हो तो धन पाता है, विद्याकी अभिलाषा रखता हो तो उसे विद्या प्राप्त होती है और पत्नीकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको पत्नी सुलभ होती है ।। ७६ ।। उभे संध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि । आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।। ७७ ।। स्त्री हो या पुरुष यदि दोनों संध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है तो आपत्तिमें पड़कर भी उससे मुक्त हो जाता है। बन्धनमें पड़ा हुआ मनुष्य बन्धनसे मुक्त हो जाता है ।। ७७ ।। एतद् ब्रह्मा ददौ पूर्वं शक्राय सुमहात्मने ।