भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 720

'उसकी आकृति षट्कोणके समान होगी। वह महान् एवं घोर शत्रुनाशक अस्त्र भयंकर गड़गड़ाहट पैदा करनेवाला होगा। उस वज्रके द्वारा इन्द्र निश्चय ही वृत्रासुरका वध कर डालेंगे ।। ११ ।।

एतद् वः सर्वमाख्यातं तस्माच्छीघ्रं विधीयताम् । एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्य पितामहम् ।। १२ ।। नारायणं पुरस्कृत्य दधीचस्वाश्रमं ययुः । सरस्वत्याः परे पारे नानाद्रुमलतावृतम् ।। १३ ।।

'ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दी हैं। अतः अब शीघ्रता करो।' ब्रह्माजीके ऐसा करनेपर सब देवता उनकी आज्ञा ले भगवान् नारायणको आगे करके दधीचके आश्रमपर गये। वह आश्रम सरस्वती नदीके उस पार था। अनेक प्रकारके वृक्ष और लताएँ उसे घेरे हुए थीं ।। १२-१३ ।।

षट्पदोद्गीतनिनादैर्विघुष्टं सामगैरिव । पुंस्कोकिलरवोन्मिश्रं जीवं जीवकनादितम् ।। १४ ।।

भ्रमरोंके गीतोंकी ध्वनिसे वह स्थान इस प्रकार गूँज रहा था, मानो सामगान करनेवाले ब्राह्मणोंद्वारा सामवेदका पाठ हो रहा हो। कोकिलके कलरवोंसे कूजित और दूसरे जन्तुओं (पशु-पक्षियों) के शब्दोंसे कोलाहलपूर्ण बना हुआ वह आश्रम सजीव-सा जान पड़ता था ।। १४ ।।

महिषैश्च वराहेश्च सृमरैश्चमरैरपि । तत्र तत्रानुचरितं शार्दूलभयवर्जितैः ।। १५ ।।

भैंसे, सूअर, बालमृग और चवँरी गायें बाघ-सिंहोंके भयसे रहित हो उस आश्रमके आस-पास विचर रही थीं ।। १५ ।।

करेणुभिर्वारणैश्च प्रभिन्नकरटामुखैः । सरोऽवगाढैः क्रीडद्भिः समन्तादनुनादितम् ।। १६ ।।

अपने कपोलोंसे मदकी धारा बहानेवाले हाथी और हथिनियाँ वहाँ सरोवरके जलमें गोते लगाकर क्रीड़ाएँ कर रहे थे, जिससे आश्रमके चारों ओर कोलाहल-सा हो रहा था ।। १६ ।।

सिंहव्याघ्रैर्महानादान्नदद्भिरनुनादितम् । अपरैश्चापि संलीनैर्गुहाकन्दरशायिभिः ।। १७ ।।

पर्वतोंकी गुफाओं तथा कन्दराओंमें लेटे, झाड़ियोंमें छिपे और वनमें विचरते हुए जोर-जोरसे दहाड़नेवाले सिंहों और व्याघ्रोंकी गर्जनासे वह स्थान गूँज रहा था ।।

तेषु तेष्ववकाशेषु शोभितं सुमनोरमम् । त्रिविष्टपसमप्रख्यं दधीचाश्रममागमन् ।। १८ ।।