महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्ताधिकशततमोऽध्यायः
सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति
लोमश उवाच
एतच्छ्रुत्वान्तरिक्षाच्च स राजा राजसत्तमः ।
यथोक्तं तच्चकाराथ श्रद्दधद् भरतर्षभ ।। १ ।।
लोमशजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! यह आकाशवाणी सुनकर भूपालशिरोमणि राजा सगरने उसपर विश्वास करके उसके कथनानुसार सब कार्य किया ।। १ ।।
एकैकशस्ततः कृत्वा बीजं बीजं नराधिपः ।
घृतपूर्णेषु कुम्भेषु तान् भागान् विदधे ततः ।। २ ।।
नरेशने एक-एक बीजको अलग करके उन सबको घीसे भरे हुए घड़ोंमें रखा ।। २ ।।
धात्रीश्चैकैकशः प्रादात् पुत्ररक्षणतत्परः ।
ततः कालेन महता समुत्तस्थुर्महाबलाः ।। ३ ।।
षष्टिः पुत्रसहस्राणि तस्याप्रतिमतेजसः ।
रुद्रप्रसादाद् राजर्षेः समजायन्त पार्थिव ।। ४ ।।
फिर पुत्रोंकी रक्षाके लिये तत्पर हो सबके लिये पृथक्-पृथक् धायें नियुक्त कर दीं। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उस अनुपम तेजस्वी नरेशके साठ हजार महाबली पुत्र उन घड़ोंमेंसे निकल आये। युधिष्ठिर! राजर्षि सगरके वे सभी पुत्र भगवान् शिवकी कृपासे ही उत्पन्न हुए थे ।। ३-४ ।।
ते घोराः क्रूरकर्माण आकाशपरिसर्पिणः ।
बहुत्वाच्चावजानन्तःसर्वाँल्लोकान् सहामरान् ।। ५ ।।
वे सब-के-सब भयंकर स्वभाववाले और क्रूरकर्मा थे। आकाशमें भी सब ओर घूम-फिर सकते थे। उनकी संख्या अधिक होनेके कारण वे देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंकी अवहेलना करते थे ।। ५ ।।
त्रिदशांश्चाप्यबाधन्त तथा गन्धर्वराक्षसान् ।
सर्वाणि चैव भूतानि शूराः समरशालिनः ।। ६ ।।
समरभूमिमें शोभा पानेवाले वे शूरवीर राजकुमार देवताओं, गन्धर्वों, राक्षसों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको कष्ट दिया करते थे ।। ६ ।।