महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 770, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशाधिकशततमोऽध्यायः
नन्दा तथा कौशिकीका माहात्म्य, ऋष्यशृंग मुनिका उपाख्यान और उनको अपने राज्यमें लानेके लिये राजा लोमपादका प्रयत्न
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रयातः कौन्तेयः क्रमेण भरतर्षभ ।
नन्दामपरनन्दां च नद्यौ पापभयापहे ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर क्रमशः आगे बढ़ने लगे। उन्होंने पाप और भयका निवारण करनेवाली नन्दा और अपरनन्दा—इन दो नदियोंकी यात्रा की ॥ १ ॥
पर्वतं स समासाद्य हेमकूटमनामयम् ।
अचिन्त्यानद्भुतान् भावान् ददर्श सुबहून् नृपः ॥ २ ॥
तत्पश्चात् रोग-शोकसे रहित हेमकूट पर्वतपर पहुँचकर राजा युधिष्ठिरने वहाँ बहुत-सी अचिन्त्य एवं अद्भुत बातें देखीं ॥ २ ॥
वाताबद्धा भवन्मेघा उपलाश्च सहस्रशः ।
नाशक्नुवंस्तमारोढुं विषण्णमनसो जनाः ॥ ३ ॥
वहाँ वायुका सहारा लिये बिना ही बादल उत्पन्न हो जाते और अपने-आप हजारों पत्थर (ओले) पड़ने लगते थे। जिनके मनमें खेद भरा होता था ऐसे मनुष्य उस पर्वतपर चढ़ नहीं सकते थे ॥ ३ ॥
वायुर्नित्यं ववौ तत्र नित्यं देवश्च वर्षति ।
स्वाध्यायघोषश्च तथा श्रूयते न च दृश्यते ॥ ४ ॥
सायं प्रातश्च भगवान् दृश्यते हव्यवाहनः ।
मक्षिकाश्चादशंस्तत्र तपसः प्रतिघातिकाः ॥ ५ ॥
निर्वेदो जायते तत्र गृहाणि स्मरते जनः ।
एवं बहुविधान् भावानद्भुतान् वीक्ष्य पाण्डवः ।
लोमशं पुनरेवाथ पर्यपृच्छत् तदद्भुतम् ॥ ६ ॥
वहाँ प्रतिदिन हवा चलती और रोज-रोज मेघ वर्षा करता था। वेदोंके स्वाध्यायकी ध्वनि तो सुनायी पड़ती; परंतु स्वाध्याय करनेवालेका दर्शन नहीं होता था। सायंकाल और प्रातःकाल भगवान् अग्निदेव प्रज्वलित दिखायी देते थे। तपस्यामें विघ्न डालनेवाली मक्खियाँ वहाँ लोगोंको डंक मारती रहती थीं, अतः वहाँ विरक्ति होती और लोग घरोंकी