भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 792, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 792

सन्तारितां नावमथातिशुभ्राम् । नीरादुपादाय तथैव चक्रे नाव्याश्रमं नाम वनं विचित्रम् ॥ ९ ॥ नाविकोंद्वारा संचालित उस अत्यन्त उज्ज्वल नौकाको जलसे बाहर निकालकर राजाने एक स्थानपर स्थापित कर दिया और जितनी दूरीसे वह नौकागत आश्रम दिखायी देता था, उतनी दूरीके विस्तृत मैदानमें उन्होंने ऋष्यशृंग मुनिके आश्रम-जैसे ही एक विचित्र वनका निर्माण करा दिया, जो ‘नाव्याश्रम’ के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ९ ॥

अन्तःपुरे तं तु निवेश्य राजा विभाण्डकस्यात्मजमेकपुत्रम् । ददर्श देवं सहसा प्रवृष्ट- मापूर्यमाणं च जगज्जलेन ॥ १० ॥ राजा लोमपादने विभाण्डक मुनिके इकलौते पुत्रको महलके भीतर रनिवासमें ठहरा दिया और देखा, सहसा उसी क्षण इन्द्रदेवने वर्षा आरम्भ कर दी तथा सारा जगत् जलसे परिपूर्ण हो गया ॥ १० ॥

स लोमपादः परिपूर्णकामः सुतां ददावृष्यशृङ्गाय शान्ताम् । क्रोधप्रतीकारकरं च चक्रे गाश्चैव मार्गेषु च कर्षणानि ॥ ११ ॥ लोमपादकी कामना पूरी हुई। उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृंग मुनिको ब्याह दी। फिर विभाण्डक मुनिके क्रोधके निवारणका भी उपाय कर दिया। जिस रास्तेसे महर्षि आनेवाले थे, उसमें स्थान-स्थानपर बहुत-से गाय-बैल रखवा दिये और किसानोंद्वारा खेतोंकी जुताई आरम्भ करा दी ॥ ११ ॥

विभाण्डकस्याव्रजतः स राजा पशून् प्रभूतान् पशूपांश्च वीरान् । समादिशत् पुत्रगृद्धी महर्षि- र्विभाण्डकः परिपृच्छेद् यदा वः ॥ १२ ॥ स वक्तव्यः प्राञ्जलिभिर्भवद्भिः पुत्रस्य ते पशवः कर्षणं च । किं ते प्रियं वै क्रियतां महर्षे दासाः स्म सर्वे तव वाचि बद्धाः ॥ १३ ॥ राजाने विभाण्डक मुनिके आगमन-पथमें बहुत-से पशु तथा वीर पशुरक्षक भी नियुक्त कर दिये और सबको यह आदेश दे दिया था कि जब पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाले महर्षि विभाण्डक तुमसे पूछें तब हाथ जोड़कर उन्हें इस प्रकार उत्तर देना—‘ये सब आपके पुत्रके