भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

राजा गयके यज्ञकी प्रशंसा, पयोष्णी, वैदूर्य पर्वत और नर्मदाके माहात्म्य तथा च्यवन-सुकन्याके चरित्रका आरम्भ

लोमश उवाच

नृगेण यजमानेन सोमेनेह पुरंदरः ।
तर्पितः श्रूयते राजन् स तृप्तो मुदमभ्यगात् ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! सुना जाता है कि इस पयोष्णी नदीके तटपर राजा नृगने यज्ञ करके सोमरसके द्वारा देवराज इन्द्रको तृप्त किया था। उस समय इन्द्र पूर्णतः तृप्त होकर आनन्दमग्न हो गये थे ॥ १ ॥

इह देवैः सहेन्द्रैश्च प्रजापतिभिरेव च ।
इष्टं बहुविधैर्यज्ञैर्महद्भिर्भूरिदक्षिणैः ॥ २ ॥
यहीं इन्द्रसहित देवताओंने और प्रजापतियोंने भी प्रचुर दक्षिणासे युक्त अनेक प्रकारके बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन किया है ॥ २ ॥

आमूर्तरयसश्चेह राजा वज्रधरं प्रभुम् ।
तर्पयामास सोमेन हयमेधेषु सप्तसु ॥ ३ ॥
अमूर्तरयाके पुत्र राजा गयने भी यहाँ सात अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करके उनमें सोमरसके द्वारा वज्रधारी इन्द्रको संतुष्ट किया था ॥ ३ ॥

तस्य सप्तसु यज्ञेषु सर्वमासीद्धिरण्मयम् ।
वानस्पत्यं च भौमं च यद् द्रव्यं नियतं मखे ॥ ४ ॥
यज्ञमें जो वस्तुएँ नियमितरूपसे काष्ठ और मिट्टीकी बनी हुई होती हैं, ये सब-की सब राजा गयके उक्त सातों यज्ञोंमें सुवर्णसे बनायी गयी थीं ॥ ४ ॥

चषालयूपचमसाः स्थाल्यः पात्र्यः स्रुचः स्रुवाः ।
तेष्वेव चास्य यज्ञेषु प्रयोगाः सप्त विश्रुताः ॥ ५ ॥
प्रायः यज्ञोंमें ^१चषाल, ^२यूप, ^३चमस, ^४स्थाली, ^५पात्री, ^६स्रुक् और ^७स्रुवा—ये सात साधन उपयोगमें लाये जाते हैं। राजा गयके पूर्वोक्त सातों यज्ञोंमें ये सभी उपकरण सुवर्णके ही थे, ऐसा सुना जाता है ॥ ५ ॥

सप्तैकैकस्य यूपस्य चषालाश्चोपरि स्थिताः ।
तस्य स्म यूपान् यज्ञेषु भ्राजमानान् हिरण्मयान् ॥ ६ ॥
स्वयमुत्थापयामासुर्देवाः सेन्द्रा युधिष्ठिर ।
तेषु तस्य मखाग्र्येषु गयस्य पृथिवीपतेः ॥ ७ ॥