भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 843

अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः । प्रसंख्यानानसंख्येयान् प्रत्यगृह्णन् द्विजातयः ॥ ८ ॥ सात यूपोंमेंसे प्रत्येकके ऊपर सात-सात चषाल थे। युधिष्ठिर! उन यज्ञोंमें जो चमकते हुए सुवर्णमय यूप थे, उन्हें इन्द्र आदि देवताओंने स्वयं खड़ा किया था। राजा गयके उन उत्तम यज्ञोंमें इन्द्र सोमपान करके और ब्राह्मण बहुत-सी दक्षिणा पाकर हर्षोन्मत्त हो गये थे। ब्राह्मणोंने दक्षिणामें जो बहुसंख्यक धनराशि प्राप्त की थी, उसकी गणना नहीं की जा सकती थी ॥ ६—८ ॥ सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारकाः । यथा वा वर्षतो धारा असंख्येयाः स्म केनचित् ॥ ९ ॥ तथैव तदसंख्येयं धनं यत् प्रददौ गयः । सदस्येभ्यो महाराज तेषु यज्ञेषु सप्तसु ॥ १० ॥ महाराज! राजा गयने सातों यज्ञोंमें सदस्योंको, जो असंख्य धन प्रदान किया था, उसकी गणना उसी प्रकार नहीं हो सकती थी, जैसे इस जगत्में कोई बालूके कणों, आकाशके तारों और वर्षाकी धाराओंको नहीं गिन सकता ॥ ९-१० ॥ भवेत् संख्येयमेतद्धि यदेतत् परिकीर्तितम् । न तस्य शक्याः संख्यातुं दक्षिणा दक्षिणावतः ॥ ११ ॥ उपर्युक्त बालूके कण आदि कदाचित् गिने भी जा सकते हैं, परंतु दक्षिणा देनेवाले राजा गयकी दक्षिणाकी गणना करना सम्भव नहीं है ॥ ११ ॥ हिरण्मयीभिर्गोभिश्च कृताभिर्विश्वकर्मणा । ब्राह्मणांस्तर्पयामास नानादिग्भ्यः समागतान् ॥ १२ ॥ अल्पावशेषा पृथिवी चैत्यैरासीन्महात्मनः । गयस्य यजमानस्य तत्र तत्र विशाम्पते ॥ १३ ॥ उन्होंने विश्वकर्माकी बनायी हुई सुवर्णमयी गौएँ देकर विभिन्न दिशाओंसे आये हुए ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया था। युधिष्ठिर! भिन्न-भिन्न स्थानोंमें यज्ञ करनेवाले महामना राजा गयके राज्यकी थोड़ी ही भूमि ऐसी बच गयी थी जहाँ यज्ञके मण्डप न हों ॥ १२-१३ ॥ स लोकान् प्राप्तवानैन्द्रान् कर्मणा तेन भारत । सलोकतां तस्य गच्छेत् पयोष्ण्यां य उपस्पृशेत् ॥ १४ ॥ भारत! उस यज्ञकर्मके प्रभावसे गयने इन्द्रादि लोकोंको प्राप्त किया। जो इस पयोष्णी नदीमें स्नान करता है वह भी राजा गयके समान पुण्यलोकका भागी होता है ॥ १४ ॥ तस्मात् त्वमत्र राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितोऽच्युत । उपस्पृश्य महीपाल धूतपाप्मा भविष्यसि ॥ १५ ॥ अतः राजेन्द्र! तुम भाइयोंसहित इसमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे ॥ १५ ॥