भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 844

वैशम्पायन उवाच

स पयोष्ण्यां नरश्रेष्ठः स्नात्वा वै भ्रातृभिः सह । वैदूर्यपर्वतं चैव नर्मदां च महानदीम् ।। १६ ।। (उद्दिश्य पाण्डवश्रेष्ठः स प्रतस्थे महीपतिः ।) समागमत तेजस्वी भ्रातृभिः सहितोऽनघ । तत्रास्य सर्वाण्याचख्यौ लोमशो भगवानृषिः ।। १७ ।। तीर्थानि रमणीयानि पुण्यान्यायतनानि च । यथायोगं यथाप्रीति प्रययौ भ्रातृभिः सह । तत्र तत्राददाद् वित्तं ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः ।। १८ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—निष्पाप जनमेजय! पाण्डवप्रवर नरश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर भाइयोंसहित पयोष्णी नदीमें स्नान करके वैदूर्यपर्वत और महानदी नर्मदाके तटपर जानेका उद्देश्य लेकर वहाँसे चल दिये और वे तेजस्वी नरेश सब भाइयोंको साथ लिये यथासमय अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँच गये। वहाँ भगवान् लोमश मुनिने उनसे समस्त रमणीय तीर्थों और पवित्र देवस्थानोंका परिचय कराया। तत्पश्चात् राजाने अपनी सुविधा और प्रसन्नताके अनुसार सहस्रों ब्राह्मणोंको धनका दान किया और भाइयोंसहित उन सब स्थानोंकी यात्रा की ।। १६—१८ ।।

लोमश उवाच

देवानामेति कौन्तेय तथा राज्ञां सलोकताम् । वैदूर्यपर्वतं दृष्ट्वा नर्मदामवतीर्य च ।। १९ ।। लोमशजीने कहा—कुन्तीनन्दन! वैदूर्यपर्वतका दर्शन करके नर्मदामें उतरनेसे मनुष्य देवताओं तथा पुण्यात्मा राजाओंके समान पवित्र लोकोंको प्राप्त कर लेता है ।। १९ ।। संधिरेष नरश्रेष्ठ त्रेताया द्वापरस्य च । एनमासाद्य कौन्तेय सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। २० ।। नरश्रेष्ठ! यह वैदूर्यपर्वत त्रेता और द्वापरकी सन्धिमें प्रकट हुआ है, इसके निकट जाकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। २० ।। एष शर्यार्तियज्ञस्य देशस्तात प्रकाशते । साक्षाद् यत्रापिबत् सोममश्विभ्यां सह कौशिकः ।। २१ ।। तात! यह राजा शर्यातिके यज्ञका स्थान प्रकाशित हो रहा है जहाँ साक्षात् इन्द्रने अश्विनीकुमारोंके साथ बैठकर सोमपान किया था ।। २१ ।। चुकोप भार्गवश्चापि महेन्द्रस्य महातपाः । संस्तम्भयामास च तं वासवं च्यवनः प्रभुः । सुकन्यां चापि भार्यां स राजपुत्रीमवाप्तवान् ।। २२ ।।