महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 856, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना
लोमश उवाच
ततः शुश्राव शर्यातिर्वयःस्थं च्यवनं कृतम् ।
सुहृष्टः सेनया सार्धमुपायाद् भार्गवाश्रमम् ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर राजा शर्यातिने सुना कि महर्षि च्यवन युवावस्थाको प्राप्त हो गये; इस समाचारसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सेनाके साथ महर्षि च्यवनके आश्रमपर आये ॥ १ ॥
च्यवनं च सुकन्यां च दृष्ट्वा देवसुताविव ।
रेमे सभार्यः शर्यातिः कृत्स्नां प्राप्य महीमिव ॥ २ ॥
ऋषिणा सत्कृतस्तेन सभार्यः पृथिवीपतिः ।
उपोपविष्टः कल्याणीः कथाश्चक्रे मनोरमाः ॥ ३ ॥
च्यवन और सुकन्याको देवकुमारोंके समान सुखी देखकर पत्नीसहित शर्यातिको महान् हर्ष हुआ, मानो उन्हें सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य मिल गया हो। च्यवन ऋषिने रानियोंसहित राजाका बड़ा आदर-सत्कार किया और उनके पास बैठकर मनको प्रिय लगनेवाली कल्याणमयी कथाएँ सुनायीं ॥ २-३ ॥
अथैनं भार्गवो राजन्नुवाच परिसान्त्वयन् ।
याजयिष्यामि राजंस्त्वां सम्भारानवकल्पय ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! तत्पश्चात् भृगुनन्दन च्यवनने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—‘राजन्! मैं आपसे यज्ञ कराऊँगा। आप सामग्री जुटाइये’ ॥ ४ ॥
ततः परमसंहृष्टः शर्यातिरवनीपतिः ।
च्यवनस्य महाराज तद् वाक्यं प्रत्यपूजयत् ॥ ५ ॥
महाराज! यह सुनकर राजा शर्याति बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने च्यवन मुनिके उस वचनकी बड़ी सराहना की ॥ ५ ॥
प्रशस्तेऽहनि यज्ञीये सर्वकामसमृद्धिमत् ।
कारयामास शर्यातिर्यज्ञायतनमुत्तमम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर यज्ञके लिये उपयोगी शुभ दिन आनेपर शर्यातिने एक उत्तम यज्ञमण्डप तैयार करवाया, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित समृद्धियोंसे सम्पन्न था ॥ ६ ॥