महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 857, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्रैनं च्यवनो राजन् याजयामास भार्गवः । अद्भुतानि च तत्रासन् यानि तानि निबोध मे ॥ ७ ॥ राजन्! भृगुपुत्र च्यवनने उस यज्ञमण्डपमें राजासे यज्ञ करवाया। उस यज्ञमें जो अद्भुत बातें हुई थीं, उन्हें मुझसे सुनो ॥ ७ ॥
अगृह्णाच्च्यवनः सोममश्विनोर्देवयोस्तदा । तमिन्द्रो वारयामास गृह्णानं स तयोर्ग्रहम् ॥ ८ ॥ महर्षि च्यवनने उस समय दोनों अश्विनीकुमारों-को देनेके लिये सोमरसका भाग हाथमें लिया। उन दोनोंके लिये सोमका भाग ग्रहण करते समय इन्द्रने मुनिको मना किया ॥ ८ ॥
इन्द्र उवाच
उभावेतौ न सोमाहौँ नासत्याविति मे मतिः । भिषजौ दिवि देवानां कर्मणा तेन नार्हतः ॥ ९ ॥ इन्द्र बोले—मुने! मेरा यह सिद्धान्त है कि ये दोनों अश्विनीकुमार यज्ञमें सोमपानके अधिकारी नहीं हैं; क्योंकि ये द्युलोकनिवासी देवताओंके वैद्य हैं और उस वैद्यवृत्तिके कारण ही इन्हें यज्ञमें सोमपानका अधिकार नहीं रह गया है ॥ ९ ॥
च्यवन उवाच
महोत्साहौ महात्मानौ रूपद्रविणवत्तरौ । यौ चक्रतुर्मां मघवन् वृन्दारकमिवाजरम् ॥ १० ॥ ऋते त्वां विबुधांश्चान्यान् कथं वै नार्हतः सवम् । अश्विनावपि देवेन्द्र देवौ विद्धि पुरंदर ॥ ११ ॥ च्यवनने कहा—मघवन्! ये दोनों अश्विनीकुमार बड़े उत्साही और महान् बुद्धिमान् हैं। रूप-सम्पत्तिमें भी सबसे बढ़-चढ़कर हैं। इन्होंने ही मुझे देवताओंके समान दिव्य रूपसे युक्त और अजर बनाया है। देवराज! फिर तुम्हारे या अन्य देवताओंके सिवा इन्हें यज्ञमें सोमरसका भाग पानेका अधिकार क्यों नहीं है? पुरंदर! इन अश्विनीकुमारोंको भी देवता ही समझो ॥ १०-११ ॥
इन्द्र उवाच
चिकित्सकौ कर्मकरौ कामरूपसमन्वितौ । लोके चरन्तौ मर्त्यानां कथं सोममिहार्हतः ॥ १२ ॥ इन्द्र बोले—ये दोनों चिकित्सा-कार्य करते हैं और मनमाना रूप धारण करके मृत्युलोकमें भी विचरते रहते हैं, फिर इन्हें इस यज्ञमें सोमपानका अधिकार कैसे प्राप्त हो सकता है? ॥ १२ ॥
लोमश उवाच