महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएतदेव यदा वाक्यमाम्रेडयति देवराट् । अनादृत्य ततः शक्रं ग्रहं जग्राह भार्गवः ॥ १३ ॥ लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! जब देवराज इन्द्र बार-बार यही बात दुहराने लगे तब भृगुनन्दन च्यवनने उनकी अवहेलना करके अश्विनीकुमारोंको देनेके लिये सोमरसका भाग ग्रहण किया ॥ १३ ॥
ग्रहीष्यन्तं तु तं सोममश्विनोरुत्तमं तदा । समीक्ष्य बलभिद् देव इदं वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥ उस समय देववैद्योंके लिये उत्तम सोमरस ग्रहण करते देख इन्द्रने च्यवन मुनिसे इस प्रकार कहा— ॥
आभ्यामर्थाय सोमं त्वं ग्रहीष्यसि यदि स्वयम् । वज्रं ते प्रहरिष्यामि घोररूपमनुत्तमम् ॥ १५ ॥ ब्रह्मन्! यदि तुम इन दोनोंके लिये स्वयं सोमरस ग्रहण करोगे तो मैं तुमपर अपना परम उत्तम भयंकर वज्र छोड़ दूँगा ॥ १५ ॥
एवमुक्तः स्मयन्निन्द्रमभिवीक्ष्य स भार्गवः । जग्राह विधिवत् सोममश्विभ्यामुत्तमं ग्रहम् ॥ १६ ॥ उनके ऐसा कहनेपर च्यवन मुनिने मुसकराते हुए इन्द्रकी ओर देखकर अश्विनीकुमारोंके लिये विधिपूर्वक उत्तम सोमरस हाथमें लिया ॥ १६ ॥