भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 859

ततोऽस्मै प्राहरद् वज्रं घोररूपं शचीपतिः । तस्य प्रहरतो बाहुं स्तम्भयामास भार्गवः ॥ १७ ॥ तब शचीपति इन्द्र उनके ऊपर भयंकर वज्र छोड़ने लगे, परंतु वे जैसे ही प्रहार करने लगे, भृगुनन्दन च्यवनने उनकी भुजाको स्तंभित कर दिया ॥ १७ ॥

तं स्तम्भयित्वा च्यवनो जुहुवे मन्त्रतोऽनलम् । कृत्यार्थी सुमहातेजा देवं हिंसितुमुद्यतः ॥ १८ ॥ इस प्रकार उनकी भुजा स्तंभित करके महातेजस्वी च्यवन ऋषिने मन्त्रोच्चारणपूर्वक अग्निमें आहुति दी। वे देवराज इन्द्रको मार डालनेके लिये उद्यत होकर कृत्या उत्पन्न करना चाहते थे ॥ १८ ॥

ततः कृत्याथ संजज्ञे मुनेस्तस्य तपोबलात् । मदो नाम महावीर्यो बृहत्कायो महासुरः ॥ १९ ॥ शरीरं यस्य निर्देष्टुमशक्यं तु सुरासुरैः । तस्यास्यमभवद् घोरं तीक्ष्णाग्रदशनं महत् ॥ २० ॥ हनुरेका स्थिता त्वस्य भूमावेका दिवं गता । चतस्रश्चायता दंष्ट्रा योजनानां शतं शतम् ॥ २१ ॥ च्यवन ऋषिके तपोबलसे वहाँ कृत्या प्रकट हो गयी। उस कृत्याके रूपमें महापराक्रमी विशालकाय महादैत्य मदका प्रादुर्भाव हुआ। जिसके शरीरका वर्णन देवता तथा असुर भी नहीं कर सकते। उस असुरका विशाल मुख बड़ा भयंकर था। उसके आगेके दाँत बड़े तीखे दिखायी देते थे। उसका ठोड़ीसहित नीचेका ओष्ठ धरतीपर टिका हुआ था और दूसरा स्वर्गलोकतक पहुँच गया था। उसकी चार दाढ़ें सौ-सौ योजनतक फैली हुई थीं ॥ १९—२१ ॥

इतरे तस्य दशना बभूवुर्दशयोजनाः । प्रासादशिखराकाराः शूलाग्रसमदर्शनाः ॥ २२ ॥ उस दैत्यके दूसरे दाँत भी दस-दस योजन लम्बे थे। उनकी आकृति महलोंके कँगूरोंके समान थी। उनका अग्रभाग शूलके समान तीखा दिखलायी देता था ॥ २२ ॥

बाहू पर्वतसंकाशावायतावायुतं समौ । नेत्रे रविशशिप्रख्ये वक्त्रं कालाग्निसंनिभम् ॥ २३ ॥ लेलिहज्जिह्वया वक्त्रं विद्युच्चपललोलया । व्यात्ताननो घोरदृष्टिर्ग्रसन्निव जगद् बलात् ॥ २४ ॥ स भक्षयिष्यन् संक्रुद्धः शतक्रतुमुपाद्रवत् । महता घोररूपेण लोकाञ्छब्देन नादयन् ॥ २५ ॥ दोनों भुजाएँ दो पर्वतोंके समान प्रतीत होती थीं। दोनोंकी लंबाई एक समान दस-दस हजार योजनकी थी। उसके दोनों नेत्र चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रज्वलित हो रहे थे।