महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 879, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनान्यः कर्तुः फलं राजन्नुपभुङ्क्ते कदाचन । इमानि तव दृश्यन्ते फलानि वदतां वर ॥ १४ ॥ धर्मने कहा— राजन्! कर्ताके सिवा दूसरा कोई उसके किये हुए कर्मोंका फल कभी नहीं भोगता है। वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप जो ये पुण्य लोक प्राप्त हुए हैं, प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं ॥ १४ ॥
सोमक उवाच
पुण्यान्न कामये लोकानृतेऽहं ब्रह्मवादिनम् । इच्छाम्यहमनेनैव सह वस्तुं सुरालये ॥ १५ ॥ नरके वा धर्मराज कर्मणास्य समो ह्यहम् । पुण्यापुण्यफलं देव सममस्त्वावयोरिदम् ॥ १६ ॥ सोमक बोले— धर्मराज! मैं अपने वेदवेत्ता पुरोहितके बिना पुण्यलोकोंमें जानेकी इच्छा नहीं रखता। स्वर्गलोक हो या नरक—मैं कहीं भी इन्हींके साथ रहना चाहता हूँ। देव! मेरे पुण्यकर्मोंपर इनका मेरे समान ही अधिकार है। हम दोनोंको यह पुण्य और पापका फल समानरूपसे मिलना चाहिये ॥ १५-१६ ॥
धर्मराज उवाच
यद्येवमीप्सितं राजन् भुङ्क्ष्वास्य सहितः फलम् । तुल्यकालं सहानेन पश्चात् प्राप्स्यसि सद्गतिम् ॥ १७ ॥ धर्मराज बोले— राजन्! यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो इनके साथ रहकर उतने ही समयतक तुम भी पापकर्मोंका फल भोगो, इसके बाद तुम्हें उत्तम गति प्राप्त होगी ॥ १७ ॥
लोमश उवाच
स चकार तथा सर्वं राजा राजीवलोचनः । क्षीणपापश्च तस्मात् स विमुक्तो गुरुणा सह ॥ १८ ॥ लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब कमलनयन राजा सोमकने धर्मराजके कथनानुसार सब कार्य किया और भोगद्वारा पाप नष्ट हो जानेपर वे पुरोहितके साथ ही नरकसे छूट गये ॥ १८ ॥ लेभे कामाञ्छुभान् राजन् कर्मणा निर्जितान् स्वयम् । सह तेनैव विप्रेण गुरुणा स गुरुप्रियः ॥ १९ ॥ तत्पश्चात् उन गुरुप्रेमी नरेशने अपने गुरुके साथ ही पुण्यकर्मोंद्वारा स्वयं प्राप्त किये हुए पुण्य-लोकके शुभ भोगोंका उपभोग किया ॥ १९ ॥ एष तस्याश्रमः पुण्यो य एषोऽग्रे विराजते ।