महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1045, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंधृष्टद्युम्नमुखान् वीरान् सुहृदः समभाषत । भयंकर पराक्रमी भीमसेनसे ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने धृष्टद्युम्न आदि वीर सुहृदोंसे कहा— ॥ ३९ ॥ श्रुतं वस्तस्पापस्य धार्तराष्ट्रस्य भाषितम् ॥ ४० ॥ कुत्सनं वासुदेवस्य मम चैव विशेषतः । श्रुत्वा भवन्तः संरब्धा अस्माकं हितकाम्यया ॥ ४१ ॥ ‘बन्धुओ! आपलोगोंने उस पापी दुर्योधनकी बात सुनी है न? इसमें उसके द्वारा विशेषतः मेरी और भगवान् श्रीकृष्णकी निन्दा की गयी है। आपलोग हमारे हितकी कामना रखते हैं, इसलिये इस निन्दाको सुनकर कुपित हो उठे हैं ॥ ४०-४१ ॥ प्रभावाद् वासुदेवस्य भवतां च प्रयत्नतः । समग्रं पार्थिवं क्षत्रं सर्वं न गणयाम्यहम् ॥ ४२ ॥ ‘परंतु भगवान् वासुदेवके प्रभाव और आपलोगोंके प्रयत्नसे मैं इस समस्त भूमण्डलके सम्पूर्ण क्षत्रियोंको भी कुछ नहीं गिनता हूँ ॥ ४२ ॥ भवद्भिः समनुज्ञातो वाक्यमस्य यदुत्तरम् । उलूके प्रापयिष्यामि यद् वक्ष्यति सुयोधनम् ॥ ४३ ॥ ‘यदि आपलोगोंकी आज्ञा हो तो मैं इस बातका उत्तर उलूकको दे दूँ, जिसे यह दुर्योधनको सुना देगा ॥ ४३ ॥ श्वोभूते कत्थितस्यास्य प्रतिवाक्यं चमूमुखे । गाण्डीवेनाभिधास्यामि क्लीबा हि वचनोत्तराः ॥ ४४ ॥ ‘अथवा आपकी सम्मति हो, तो कल सबेरे सेनाके मुहानेपर उसकी इन शेखीभरी बातोंका ठीक-ठीक उत्तर गाण्डीव धनुषद्वारा दे दूँगा; क्योंकि केवल बातोंमें उत्तर देनेवाले तो नपुंसक होते हैं' ॥ ४४ ॥ ततस्ते पार्थिवाः सर्वे प्रशंसुर्धनंजयम् । तेन वाक्योपचारेण विस्मिता राजसत्तमाः ॥ ४५ ॥ अर्जुनकी इस प्रवचन-शैलीसे सभी श्रेष्ठ भूपाल आश्चर्यचकित हो उठे और वे सब-के-सब उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ४५ ॥ अनुनीय च तान् सर्वान् यथामान्यं यथावयः । धर्मराजस्तदा वाक्यं तत्प्राप्यं प्रत्यभाषत ॥ ४६ ॥ तदनन्तर धर्मराजने उन समस्त राजाओंको उनकी अवस्था और प्रतिष्ठाके अनुसार अनुनय-विनय करके शान्त किया और दुर्योधनको देनेयोग्य जो संदेश था, उसे इस प्रकार कहा— ॥ ४६ ॥ आत्मानमवमन्वानो न हि स्यात् पार्थिवोत्तमः । तत्रोत्तरं प्रवक्ष्यामि तव शुश्रूषणे रतः ॥ ४७ ॥