महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'ओ पापी! मैं इन वीर सैनिकोंकी सभामें गर्वीले शूरवीरके योग्य वचन बोल रहा हूँ। तू इसे सुन ले और अपने पिताके पास जाकर सुना दे ।। ३१ ।।
नास्माकं भविता भेदः कदाचित् कुरुभिः सह ।
धृतराष्ट्रस्य सम्बन्धो यदि न स्यात् त्वया सह ।। ३२ ।।
'यदि धृतराष्ट्रका तेरे साथ सम्बन्ध न होता, तो कभी कौरवोंके साथ हमलोगोंकी फूट नहीं होती ।। ३२ ।।
त्वं तु लोकविनाशाय धृतराष्ट्रकुलस्य च ।
उत्पन्नो वैरपुरुषः स्वकुलघ्नश्च पापकृत् ।। ३३ ।।
'तू सम्पूर्ण जगत् तथा धृतराष्ट्रकुलके विनाशके लिये पापाचारी मूर्तिमान् वैरपुरुष होकर उत्पन्न हुआ है। तू अपने कुलका भी नाश करनेवाला है ।। ३३ ।।
जन्मप्रभृति चास्माकं पिता ते पापपूरुषः ।
अहितानि नृशंसानि नित्यशः कर्तुमिच्छति ।। ३४ ।।
'उलूक! तेरा पापात्मा पिता जन्मसे ही हम—लोगोंके प्रति प्रतिदिन क्रूरतापूर्ण अहितकर बर्ताव करना चाहता है ।। ३४ ।।
तस्य वैरानुषङ्गस्य गन्तास्म्यन्तं सुदुर्गमम् ।
अहमादौ निहत्य त्वां शकुनेः सम्प्रपश्यतः ।। ३५ ।।
ततोऽस्मि शकुनिं हन्तामिषतां सर्वधन्विनाम् ।
'इसलिये मैं शकुनिके देखते-देखते सबसे पहले तेरा वध करके सम्पूर्ण धनुर्धरोंके सामने शकुनिको भी मार डालूँगा और इस प्रकार अत्यन्त दुर्गम शत्रुतासे पार हो जाऊँगा' ।। ३५ ।।
भीमस्य वचनं श्रुत्वा सहदेवस्य चोभयोः ।। ३६ ।।
उवाच फाल्गुनो वाक्यं भीमसेनं स्मयन्निव ।
भीमसेन न ते सन्ति येषां वैरं त्वया सह ।। ३७ ।।
मन्दा गृहेषु सुखिनो मृत्युपाशवशं गताः ।
भीमसेन और सहदेव दोनोंके वचन सुनकर अर्जुनने भीमसेनसे मुसकराते हुए कहा—'आर्य भीम! जिनका आपके साथ वैर ठन गया है, वे घरमें बैठकर सुखका अनुभव करनेवाले मूर्ख कौरव कालके पाशमें बँध गये हैं (अर्थात् उनका जीवन नहींके बराबर है) ।। ३६-३७ ।।
उलूकश्च न ते वाच्यः परुषं पुरुषोत्तम ।। ३८ ।।
दूताः किमपराध्यन्ते यथोक्तस्यानुभाषिणः ।
'पुरुषोत्तम! आपको इस उलूकसे कोई कठोर बात नहीं कहनी चाहिये। बेचारे दूतोंका क्या अपराध है? वे तो कही हुई बातका अनुवादमात्र करनेवाले हैं' ।। ३८ ।।
एवमुक्त्वा महाबाहुर्भीमं भीमपराक्रमम् ।। ३९ ।।