महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1043, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वं कालचोदितो नूनं गन्तुकामो यमक्षयम् । गच्छस्वाहवमस्माभिस्तच्च श्वो भविता ध्रुवम् ॥ २४ ॥ ‘परंतु तू निश्चय ही कालसे प्रेरित हो यमलोकमें जाना चाहता है (इसीलिये संधिकी बात नहीं मान सका)। अच्छा, हमारे साथ युद्धमें चल। कल निश्चय ही युद्ध होगा ॥ २४ ॥
मयापि च प्रतिज्ञातो वधः सभ्रातृकस्य ते । स तथा भविता पाप नात्र कार्या विचारणा ॥ २५ ॥ ‘पापात्मन्! मैंने भी जो तेरे और तेरे भाइयोंके वधकी प्रतिज्ञा की है, वह उसी रूपमें पूर्ण होगी। इस विषयमें तुझे कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ २५ ॥
वेलामतिक्रमेत् सद्यः सागरो वरुणालयः । पर्वताश्च विशीर्येयुर्मयोक्तं न मृषा भवेत् ॥ २६ ॥ ‘वरुणालय समुद्र शीघ्र ही अपनी सीमाका उल्लंघन कर जाय और पर्वत जीर्ण-शीर्ण होकर बिखर जायँ, परंतु मेरी कही हुई बात झूठी नहीं हो सकती ॥ २६ ॥
सहायस्ते यदि यमः कुबेरो रुद्र एव वा । यथाप्रतिज्ञं दुर्बुद्धे प्रकरिष्यन्ति पाण्डवाः । दुःशासनस्य रुधिरं पाता चास्मि यथेप्सितम् ॥ २७ ॥ ‘दुर्बुद्धे! तेरी सहायताके लिये यमराज, कुबेर अथवा भगवान् रुद्र ही क्यों न आ जायँ, पाण्डव अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार सब कार्य अवश्य करेंगे। मैं अपनी इच्छाके अनुसार दुःशासनका रक्त अवश्य पीऊँगा ॥ २७ ॥
यश्चेह प्रतिसंरब्धः क्षत्रियो माभियास्यति । अपि भीष्मं पुरस्कृत्य तं नेष्यामि यमक्षयम् ॥ २८ ॥ ‘उस समय साक्षात् भीष्मको भी आगे करके जो कोई भी क्षत्रिय क्रोधपूर्वक मेरे ऊपर धावा करेगा, उसे उसी क्षण यमलोक पहुँचा दूँगा ॥ २८ ॥
यच्चैतदुक्तं वचनं मया क्षत्रस्य संसदि । यथैतद् भविता सत्यं तथैवात्मानमालभे ॥ २९ ॥ ‘मैंने क्षत्रियोंकी सभामें यह बात कही है, जो अवश्य सत्य होगी। यह मैं अपनी सौगन्ध खाकर कहता हूँ’ ॥ २९ ॥
भीमसेनवचः श्रुत्वा सहदेवोऽप्यमर्षणः । क्रोधसंरक्तनयनस्ततो वाक्यमुवाच ह ॥ ३० ॥ भीमसेनका वचन सुनकर सहदेवका भी अमर्ष जाग उठा। तब उन्होंने भी क्रोधसे आँखें लाल करके यह बात कही— ॥ ३० ॥
शौटीरशूरसदृशमनीकजनसंसदि । शृणु पाप वचो मह्यं यद्वाच्यो हि पिता त्वया ॥ ३१ ॥