भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1042

दन्तान् दन्तेषु निष्पिष्य सृक्किणी परिलेलिहन् । धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, महारथी सात्यकि, पाँच भाई केकयराजकुमार, राक्षस घटोत्कच, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, अभिमन्यु, राजा धृष्टकेतु, पराक्रमी भीमसेन तथा महारथी नकुल-सहदेव—ये सब-के-सब क्रोधसे लाल आँखें किये अपने आसनोंसे उछलकर खड़े हो गये और अंगद, पारिहार्य (मोतियोंके गुच्छों) तथा केयूरोंसे विभूषित एवं लाल चन्दनसे चर्चित अपनी सुन्दर भुजाओंको थामकर दाँतोंपर दाँत रगड़ते हुए ओठोंके दोनों कोने चाटने लगे ॥ १४—१६ १/२ ॥

तेषामाकारभावज्ञः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ॥ १७ ॥ उदतिष्ठत् स वेगेन क्रोधेन प्रज्वलन्निव । उद्वृत्य सहसा नेत्रे दन्तान् कटकटाय्य च ॥ १८ ॥ हस्तं हस्तेन निष्पिष्य उलूकं वाक्यमब्रवीत् । उनकी आकृति और भावको जानकर कुन्तीपुत्र वृकोदर बड़े वेगसे उठे और क्रोधसे जलते हुएके समान सहसा आँखें फाड़-फाड़कर देखते, दाँत कट-कटाते और हाथ-से-हाथ रगड़ते हुए उलूकसे इस प्रकार बोले— ॥ १७-१८ १/२ ॥

अशक्तानामिवास्माकं प्रोत्साहननिमित्तकम् ॥ १९ ॥ श्रुतं ते वचनं मूर्ख यत् त्वां दुर्योधनोऽब्रवीत् । ‘ओ मूर्ख! दुर्योधनने तुझसे जो कुछ कहा है, वह तेरा वचन हमने सुन लिया। मानो हम असमर्थ हों और तू हमें प्रोत्साहन देनेके निमित्त यह सब कुछ कह रहा हो ॥ १९ १/२ ॥

तन्मे कथयते मन्द शृणु वाक्यं दुरासदम् ॥ २० ॥ सर्वक्षत्रस्य मध्ये तं यद् वक्ष्यसि सुयोधनम् । शृण्वतः सूतपुत्रस्य पितुश्च त्वं दुरात्मनः ॥ २१ ॥ ‘मूर्ख उलूक! अब तू मेरी कही हुई दुःसह बातें सुन और समस्त राजाओंकी मण्डलीमें सूतपुत्र कर्ण और अपने दुरात्मा पिता शकुनिके सामने दुर्योधनको सुना देना— ॥ २०-२१ ॥

अस्माभिः प्रीतकामैस्तु भ्रातुर्ज्येष्ठस्य नित्यशः । मर्षितं ते दुराचार तत् त्वं न बहु मन्यसे ॥ २२ ॥ ‘दुराचारी दुर्योधन! हमलोगोंने सदा अपने बड़े भाईको प्रसन्न रखनेकी इच्छासे तेरे बहुत-से अत्याचारोंको चुपचाप सह लिया है; परंतु तू इन बातोंको अधिक महत्त्व नहीं दे रहा है ॥ २२ ॥

प्रेषितश्चहृषीकेशः शमाकाङ्क्षी कुरून् प्रति । कुलस्य हितकामेन धर्मराजेन धीमता ॥ २३ ॥ ‘बुद्धिमान् धर्मराजने कौरवकुलके हितकी इच्छासे शान्ति चाहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णको कौरवोंके पास भेजा था ॥ २३ ॥