महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1053, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें‘परंतु तेरा मन लोभ और तृष्णामें डूबा हुआ है। तू मूर्खताके कारण अपनी झूठी प्रशंसा करता है और भगवान् श्रीकृष्णके हितकारक वचनको भी नहीं मान रहा है॥ २८॥ किं चेदानीं बहुक्तेन युध्यस्व सह बान्धवैः। ‘अब इस समय अधिक कहनेसे क्या लाभ? तू अपने भाई-बन्धुओंके साथ आकर युद्ध कर’॥ २८॥ मम विप्रियकर्तारं कैतव्य ब्रूहि कौरवम्॥ २९॥ श्रुतं वाक्यं गृहीतोऽर्थो मतं यत् ते तथास्तु तत्। ‘उलूक! तू मेरा अप्रिय करनेवाले दुर्योधनसे कहना—‘तेरा संदेश सुना और उसका अभिप्राय समझ लिया। तेरी जैसी इच्छा है, वैसा ही हो’॥ २९॥ भीमसेनस्तता वाक्यं भूय आह नृपात्मजम्॥ ३०॥ उलूक मद्वचो ब्रूहि दुर्मतिं पापपूरुषम्। शठं नैकृतिकं पापं दुराचारं सुयोधनम्॥ ३१॥ तदनन्तर भीमसेनने पुनः राजकुमार उलूकसे यह बात कही—‘उलूक! तू दुर्बुद्धि, पापात्मा, शठ, कपटी, पापी तथा दुराचारी दुर्योधनसे मेरी यह बात भी कह देना—॥ ३०-३१॥ गृध्रोदरे वा वस्तव्यं पुरे वा नागसाह्वये। प्रतिज्ञातं मया तच्च सभामध्ये नराधम॥ ३२॥ कर्ताहं तद् वचः सत्यं सत्येनैव शपामि ते। ‘नराधम! तुझे या तो मरकर गीधके पेटमें निवास करना चाहिये या हस्तिनापुरमें जाकर छिप जाना चाहिये। मैंने सभामें जो प्रतिज्ञा की है, उसे अवश्य सत्य कर दिखाऊँगा। यह बात मैं सत्यकी ही शपथ खाकर तुझसे कहता हूँ॥ ३२॥ दुःशासनस्य रुधिरं हत्वा पास्याम्यहं मृधे॥ ३३॥ सक्थिनी तव भङ्क्त्वैव हत्वा हि तव सोदरान्। सर्वेषां धार्तराष्ट्राणामहं मृत्युः सुयोधन॥ ३४॥ ‘मैं युद्धमें दुःशासनको मारकर उसका रक्त पीऊँगा और तेरे सारे भाइयोंको मारकर तेरी जाँघें भी तोड़कर ही रहूँगा। सुयोधन! मैं धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंकी मृत्यु हूँ॥ ३३-३४॥ सर्वेषां राजपुत्राणामभिमन्युरसंशयम्। कर्मणा तोषयिष्यामि भूयश्चैव वचः शृणु॥ ३५॥ ‘इसी प्रकार सारे राजकुमारोंकी मृत्युका कारण अभिमन्यु होगा, इसमें संशय नहीं है। मैं अपने पराक्रमद्वारा तुझे अवश्य संतुष्ट करूँगा। तू मेरी एक बात और सुन ले॥ ३५॥ हत्वा सुयोधन त्वां वै सहितं सर्वसोदरैः। आक्रमिष्ये पदा मूर्ध्नि धर्मराजस्य पश्यतः॥ ३६॥