महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविजयसाधक उपर्युक्त उपकरणोंको खो देनेसे मेरी दृष्टिमें यह कर्ण अर्धरथी है। अर्जुनसे भिड़नेपर यह कदापि जीवित नहीं बच सकता।। ५–७।।
ततोऽब्रवीत् पुनद्र्रोणः सर्वशस्त्रभृतां वरः।
एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं न मिथ्यास्ति कदाचन ।। ८ ।।
यह सुनकर समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य भी बोल उठे—'आप जैसा कहते हैं, बिलकुल ठीक है। आपका यह मत कदापि मिथ्या नहीं है ।। ८ ।।
रणे रणेऽभिमानी च विमुखश्चापि दृश्यते ।
घृणी कर्णः प्रमादी च तेन मेऽर्धरथो मतः ।। ९ ।।
'यह प्रत्येक युद्धमें घमंड तो बहुत दिखाता है; परंतु वहाँसे भागता ही देखा जाता है। कर्ण दयालु और प्रमादी है। इसलिये मेरी रायमें भी यह अर्धरथी ही है' ।। ९ ।।
एतच्छ्रुत्वा तु राधेयः क्रोधादुत्फाल्य लोचने ।
उवाच भीष्मं राधेयस्तुदन् वाग्भिः प्रतोदवत् ।। १० ।।
यह सुनकर राधानन्दन कर्ण क्रोधसे आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगा और अपने वचनरूपी चाबुकसे पीड़ा देता हुआ भीष्मसे बोला— ।। १० ।।
पितामह यथेष्टं मां वाक्शरैरुपकृन्तसि ।
अनागसं सदा द्वेषादेवमेव पदे पदे ।। ११ ।।
'पितामह! यद्यपि मैंने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया है, तो भी सदा मुझसे द्वेष रखनेके कारण तुम इसी प्रकार पग-पगपर मुझे अपने वाग्बाणोंद्वारा इच्छानुसार चोट पहुँचाते रहते हो ।। ११ ।।
मर्षयामि च तत् सर्वं दुर्योधनकृतेन वै ।
त्वं तु मां मन्यसे मन्दं यथा कापुरुषं तथा ।। १२ ।।
'मैं दुर्योधनके कारण यह सब कुछ चुपचाप सह लेता हूँ, परंतु तुम मुझे मूर्ख और कायरके समान समझते हो ।। १२ ।।
भवानर्धरथो मह्यं मतो वै नात्र संशयः ।
सर्वस्य जगतश्चैव गाङ्गेयो न मृषा वदेत् ।। १३ ।।
'तुम मेरे विषयमें जो अर्धरथी होनेका मत प्रकट कर रहे हो, इससे सम्पूर्ण जगत्को निःसंदेह ऐसा ही प्रतीत होने लगेगा; क्योंकि सब यही जानते हैं कि गंगानन्दन भीष्म झूठ नहीं बोलते ।। १३ ।।
कुरूणामहितो नित्यं न च राजावबुध्यते ।
को हि नाम समानेषु राजसूदारकर्मसु ।। १४ ।।
तेजोवधमिमं कुर्याद् विभेदयिषुराहवे ।
यथा त्वं गुणविद्वेषादपरागं चिकीर्षसि ।। १५ ।।