भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1116, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1116

वे अम्बाके नाना थे। राजन्! वे काँपते हुए उठे और उस राजकन्याको गोदमें बिठाकर उसे सान्त्वना देने लगे ॥ २०॥ स तामपृच्छत् कात्स्न्र्येन व्यसनोत्पत्तिमादितः । सा च तस्मै यथावृत्तं विस्तरेण न्यवेदयत् ॥ २१ ॥ उन्होंने उसपर संकट आनेकी सारी बातें आरम्भसे ही पूछी और अम्बाने भी जो कुछ जैसे-जैसे हुआ था, वह सारा वृत्तान्त उनसे विस्तारपूर्वक बताया ॥ २१ ॥ ततः स राजर्षिरभूद् दुःखशोकसमन्वितः । कार्यं च प्रतिपेदे तन्मनसा सुमहातपाः ॥ २२ ॥ तब उन महातपस्वी राजर्षिने दुःख और शोकसे संतप्त हो मन-ही-मन आवश्यक कर्तव्यका निश्चय किया ॥ २२ ॥ अब्रवीद् वेपमानश्च कन्यामार्तां सुदुःखितः । मा गाः पितुर्गृहं भद्रे मातुस्ते जनको ह्यहम् ॥ २३ ॥ और अत्यन्त दुःखी हो काँपते हुए ही उन्होंने उस दुःखिनी कन्यासे इस प्रकार कहा—'भद्रे! (यदि) तू पिताके घर (नहीं जाना चाहती हो तो) न जा। मैं तेरी माँका पिता हूँ ॥ २३ ॥ दुःखं छिन्द्यामहं ते वै मयि वर्तस्व पुत्रिके । पर्याप्तं ते मनो वत्से यदेवं परिशुष्यसि ॥ २४ ॥ 'बेटी! मैं तेरा दुःख दूर करूँगा, तू मेरे पास रह। वत्से! तेरे मनमें बड़ा संताप है, तभी तो इस प्रकार सूखी जा रही है ॥ २४ ॥ गच्छ मद्द्वचनाद् रामं जामदग्न्यं तपस्विनम् । रामस्ते समुहृद् दुःखं शोकं चैवापनेष्यति ॥ २५ ॥ 'तू मेरे कहनेसे तपस्यापरायण जमदग्निनन्दन परशुरामजीके पास जा। वे तेरे महान् दुःख और शोकको अवश्य दूर करेंगे ॥ २५ ॥ हनिष्यति रणे भीष्मं न करिष्यति चेद् वचः । तं गच्छ भार्गवश्रेष्ठं कालाग्निसमतेजसम् ॥ २६ ॥ 'यदि भीष्म उनकी बात नहीं मानेंगे तो वे युद्धमें उन्हें मार डालेंगे। भार्गवश्रेष्ठ परशुराम प्रलय-कालकी अग्निके समान तेजस्वी हैं। तू उन्हींकी शरणमें जा ॥ २६ ॥ प्रतिष्ठापयिता स त्वां समे पथि महातपाः । ततस्तु सुस्वरं बाष्पमुत्सृजन्ती पुनः पुनः ॥ २७ ॥ अब्रवीत् पितरं मातुः सा तदा होत्रवाहनम् । अभिवादयित्वा शिरसा गमिष्ये तव शासनात् ॥ २८ ॥ 'वे महातपस्वी राम तुझे न्यायोचित मार्गपर प्रतिष्ठित करेंगे।' यह सुनकर अम्बा बारंबार आँसू बहाती हुई अपने नाना होत्रवाहनको मस्तक नवाकर प्रणाम करके मधुर