भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1124

हों, उसीको दण्ड दीजिये, जिसके कारण मैं अत्यन्त दुःखमें पड़ गयी हूँ ।। १३-१४ ।।

भीष्म उवाच

एवं कथयतामेव तेषां स दिवसो गतः । रात्रिश्च भरतश्रेष्ठ सुखशीतोष्णमारुता ।। १५ ।। भीष्मजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बातचीत करते हुए उन सब लोगोंका वह दिन बीत गया। सुखदायिनी सरदी, गरमी और हवासे युक्त रात भी समाप्त हो गयी ।। १५ ।।

ततो रामः प्रादुरासीत् प्रज्वलन्निव तेजसा । शिष्यैः परिवृतो राजन् जटाचीरधरो मुनिः ।। १६ ।। राजन्! तदनन्तर अपने शिष्योंसे घिरे हुए जटावल्कलधारी मुनिवर परशुरामजी वहाँ प्रकट हुए। वे अपने तेजके कारण प्रज्वलित-से हो रहे थे ।। १६ ।।

धनुष्पाणिरदीनात्मा खड्गं बिभ्रत् परश्वधी । विरजा राजशार्दूल सृञ्जयं सोऽभ्ययान्नृपम् ।। १७ ।। नृपश्रेष्ठ! उनके हृदयमें दीनताका नाम नहीं था। उन्होंने अपने हाथोंमें धनुष, खड्ग और परसा ले रखे थे। उनके हृदयसे रजोगुण दूर हो गया था, वे राजा सृंजयके निकट आये ।। १७ ।।

ततस्तं तापसा दृष्ट्वा स च राजा महातपाः । तस्थुः प्राञ्जलयो राजन् सा च कन्या तपस्विनी ।। १८ ।। राजन्! उन्हें देखकर वे तपस्वी मुनि, महातपस्वी नरेश तथा वह तपस्विनी राजकन्या—ये सब-के-सब हाथ जोड़कर खड़े हो गये ।। १८ ।।

पूजयामासुरव्यग्रा मधुपर्केण भार्गवम् । अर्चितश्च यथान्यायं निषसाद सहैव तैः ।। १९ ।। फिर उन्होंने स्वस्थचित्त होकर मधुपर्कद्वारा भार्गव परशुरामजीका पूजन किया। विधिपूर्वक पूजित होनेपर वे उन्हींके साथ वहाँ बैठे ।। १९ ।।

ततः पूर्वव्यतीतानि कथयन्तौ स्म तावुभौ । आसातां जामदग्न्यश्च सृञ्जयश्चैव भारत ।। २० ।। भारत! तत्पश्चात् परशुरामजी और सृंजय (होत्रवाहन) दोनों मित्र पहलेकी बीती बातें कहते हुए एक जगह बैठ गये ।। २० ।।

तथा कथान्ते राजर्षिर्भृगुश्रेष्ठं महाबलम् । उवाच मधुरं काले रामं वचनमर्थवत् ।। २१ ।। बातचीतके अन्तमें राजर्षि होत्रवाहनने महाबली भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीसे मधुर वाणीमें उस समय यह अर्थयुक्त वचन कहा— ।। २१ ।।