महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1711, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंईक्षणप्रीतिजननं शुक्राङ्गारकयोरिव ।। ५७ ।। उन दोनोंका वह घोर एवं अत्यन्त भयंकर युद्ध शुक्र और मंगलके संघर्षकी भाँति नेत्रोंके लिये हर्ष उत्पन्न करनेवाला था ।। ५७ ।। विकर्णस्तु सुतस्तुभ्यं सुतसोमं महाबलम् । अभ्ययाज्जवनैरश्वैस्ततो युद्धमवर्तत ।। ५८ ।। आपके पुत्र विकर्णने तेज चलनेवाले घोड़ोंद्वारा महाबली सुतसोमपर धावा किया। तत्पश्चात् उनमें भारी युद्ध होने लगा ।। ५८ ।। विकर्णः सुतसोमं तु विद्ध्वा नाकम्पयच्छरैः । सुतसोमो विकर्णं च तदद्भुतमिवाभवत् ।। ५९ ।। विकर्ण अपने बाणोंसे सुतसोमको घायल करके भी उन्हें कम्पित न कर सका। इसी प्रकार सुतसोम भी विकर्णको विचलित न कर सके। उन दोनोंका यह पराक्रम अद्भुत-सा प्रतीत हुआ ।। ५९ ।। सुशर्माणं नरव्याघ्रश्चेकितानो महारथः । अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धः पाण्डवार्थे पराक्रमी ।। ६० ।। नरश्रेष्ठ पराक्रमी महारथी चेकितानने पाण्डवोंके लिये अत्यन्त कुपित होकर सुशर्मापर धावा किया ।। ६० ।। सुशर्मा तु महाराज चेकितानं महारथम् । महता शरवर्षेण वारयामास संयुगे ।। ६१ ।। महाराज! सुशर्माने भारी बाण-वर्षाके द्वारा महारथी चेकितानको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। ६१ ।। चेकितानोऽपि संरब्धः सुशर्माणं महाहवे । प्राच्छादयत् तमिषुभिर्महामेघ इवाचलम् ।। ६२ ।। तब चेकितानने भी रोषमें भरकर उस महायुद्धमें अपने बाणोंकी वर्षासे सुशर्माको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे महामेघ जलकी वर्षासे पर्वतको आच्छादित कर देता है ।। ६२ ।। शकुनिः प्रतिविन्ध्यं तु पराक्रान्तं पराक्रमी । अभ्यद्रवत राजेन्द्र मत्तः सिंह इव द्विपम् ।। ६३ ।। राजेन्द्र! पराक्रमी शकुनि पराक्रमसम्पन्न प्रतिविन्ध्यपर चढ़ आया, ठीक उसी तरह जैसे मतवाला सिंह किसी हाथीपर आक्रमण करता है ।। ६३ ।। यौधिष्ठिरस्तु संक्रुद्धः सौबलं निशितैः शरैः । व्यदारयत संग्रामे मघवानिव दानवम् ।। ६४ ।। जिस प्रकार इन्द्र संग्रामभूमिमें किसी दानवको विदीर्ण करते हैं, उसी प्रकार युधिष्ठिरके पुत्र प्रतिविन्ध्यने अत्यन्त कुपित होकर सुबलपुत्र शकुनिको अपने तीखे बाणोंसे बेध डाला ।। ६४ ।।