भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2108

उस हाथीने अत्यन्त कुपित होकर रथके समूहों, हाथियों, घुड़सवारोंसहित घोड़ों तथा सैकड़ों-हजारों पैदल सिपाहियोंको भी समरांगणमें इधर-उधर दौड़ते हुए रौंद डाला ।। ५५ १/२ ।।

तेन संलोड्यमानं तु पाण्डवानां बलं महत् ।। ५६ ।।
संचुकोच महाराज चर्मेवाग्नौ समाहितम् ।
महाराज! उस हाथीके द्वारा आलोड़ित होकर पाण्डवोंकी वह विशाल सेना आगपर रखे हुए चमड़ेकी भाँति संकुचित हो गयी ।। ५६ १/२ ।।

भग्नं तु स्वबलं दृष्ट्वा भगदत्तेन धीमता ।। ५७ ।।
घटोत्कचोऽथ संक्रुद्धो भगदत्तमुपाद्रवत् ।
बुद्धिमान् भगदत्तके द्वारा अपनी सेनामें भगदड़ पड़ी हुई देख घटोत्कचने अत्यन्त कुपित होकर भगदत्तपर धावा किया ।। ५७ १/२ ।।

विकटः परुषो राजन् दीप्तास्यो दीप्तलोचनः ।। ५८ ।।
रूपं विभीषणं कृत्वा रोषेण प्रज्वलन्निव ।
राजन्! उस समय वह अत्यन्त भयानक रूप बनाकर रोषसे प्रज्वलित-सा हो उठा। उसकी आकृति विकट एवं निष्ठुर दिखायी देती थी तथा मुख और नेत्र उज्ज्वल एवं प्रकाशित हो रहे थे ।। ५८ १/२ ।।

जग्राह विमलं शूलं गिरीणामपि दारणम् ।। ५९ ।।
नागं जिघांसुः सहसा चिक्षेप च महाबलः ।
उस महाबली निशाचरने हाथीको मार डालनेकी इच्छासे एक निर्मल त्रिशूल हाथमें लिया, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण करनेवाला था। फिर सहसा उसे चला दिया ।। ५९ १/२ ।।

स विस्फुलिङ्गमालाभिः समन्तात् परिवेष्टितः ।। ६० ।।
तमापतन्तं सहसा दृष्ट्वा प्राग्ज्योतिषो नृपः ।
चिक्षेप रुचिरं तीक्ष्णमर्धचन्द्रं सुदारुणम् ।। ६१ ।।
वह त्रिशूल चारों ओरसे आगकी चिनगारियोंके समूहसे घिरा हुआ था। उसे सहसा अपने ऊपर आते देख प्राग्ज्योतिषपुरके नरेश भगदत्तने अत्यन्त भयंकर तीक्ष्ण और सुन्दर एक अर्धचन्द्राकार बाण चलाया ।। ६०-६१ ।।

चिच्छेद तन्महच्छूलं तेन बाणेन वेगवान् ।
उत्पपात द्विधा छिन्नं शूलं हेमपरिष्कृतम् ।। ६२ ।।
महाशनिर्यथा भ्रष्टा शक्रमुक्ता नभोगता ।
उन वेगवान् नरेशने उक्त बाणके द्वारा उस महान् त्रिशूलको काट डाला। वह सुवर्णभूषित त्रिशूल दो टुकड़ोंमें कटकर ऊपरकी ओर उछला। उस समय वह इन्द्रके हाथसे छूटकर आकाशसे गिरते हुए महान् वज्रके समान सुशोभित हुआ ।। ६२ १/२ ।।

शूलं निपतितं दृष्ट्वा द्विधा कृत्तं च पार्थिवः ।। ६३ ।।