महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2181, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! उन घोड़ोंकी टापसे आहत होकर यह पृथ्वी काँपने और भयंकर शब्द करने लगी ॥ १२ ॥ खुरशब्दश्च सुमहान् वाजिनां शुश्रुवे तदा । महावंशवनस्येव दह्यमानस्य पर्वते ॥ १३ ॥ उस समय घोड़ोंकी टापोंका महान् शब्द सब ओर उसी प्रकार सुनायी देने लगा, मानो पर्वतपर जलते हुए बड़े-बड़े बाँसोंके जंगलमें उनके पोरोंके फटनेका शब्द हो रहा हो ॥ १३ ॥ उत्पतद्भिश्च तैस्तत्र समुद्भूतं महद् रजः । दिवाकररथं प्राप्य छादयामास भास्करम् ॥ १४ ॥ वहाँ घोड़ोंके उछलने-कूदनेसे जो बड़े जोरकी धूलि ऊपरको उठी, उसने मानो सूर्यके रथके समीप पहुँचकर उन्हें आच्छादित कर दिया ॥ १४ ॥ वेगवद्भिर्हयैस्तैस्तु क्षोभिता पाण्डवी चमूः । निपतद्भिर्महावेगैर्हंसैरिव महत् सरः ॥ १५ ॥ उन वेगशाली अश्वोंने पाण्डवसेनाको उसी प्रकार क्षुब्ध कर दिया, जैसे महान् वेगसे उड़नेवाले हंस किसी विशाल जलाशयमें पड़कर उसे मथ डालते हैं ॥ १५ ॥ (तुरंगैर्वायुवेगैश्च तत् सैन्यं व्याकुलीकृतम् ।) ह्रेषतां चैव शब्देन न प्राज्ञायत किञ्चन । वायुके समान वेगवाले उन अश्वोंने पाण्डव-सेनाको व्याकुल कर दिया। उनके हिनहिनानेकी आवाजसे दबकर दूसरा कोई शब्द नहीं सुनायी पड़ता था ॥ १५ १/२ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १६ ॥ प्रत्यघ्नंस्तरसा वेगं समरे ह्यसादिनाम् । उद्वृत्तस्य महाराज प्रावृट्कालेऽतिपूर्यतः ॥ १७ ॥ पौर्णमास्यामम्बुवेगं यथा वेला महोदधेः । महाराज! तब राजा युधिष्ठिर तथा पाण्डुपुत्र माद्रीनन्दन नकुल-सहदेवने समरभूमिमें उन घुड़सवारोंका वेग नष्ट कर दिया। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षा-ऋतुमें अधिक जलसे परिपूर्ण होकर मर्यादा तोड़नेवाले समुद्रके पूर्णिमा तिथिमें बढ़े हुए वेगको तटकी भूमि रोक देती है ॥ १६-१७ १/२ ॥ ततस्ते रथिनो राजञ्छरैः संनतपर्वभिः ॥ १८ ॥ न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि कायेभ्यो ह्यसादिनाम् । राजन्! तत्पश्चात् वे रथी झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा घुड़सवारोंके मस्तक काटने लगे ॥ १८ १/२ ॥ ते निपेतुर्महाराज निहता दृढधन्विभिः ॥ १९ ॥ नागैरिव महानागा यथावद् गिरिगह्वरे ।