महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2227, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनीकमध्ये तिष्ठन्तं गाङ्गेयं भरतर्षभ । आशीविषमिव क्रुद्धं पाण्डवाः प्रत्यवारयन् ॥ ३१ ॥ सेनाके मध्यभागमें स्थित हुए विषधर सर्पके समान कुपित भीष्मको पाण्डव सैनिक रोकने लगे ॥ ३१ ॥
दशमेऽहनि भीष्मस्तु दर्शयञ्छक्तिमात्मनः । राजञ्छतसहस्राणि सोऽवधीत् कुरुनन्दन ॥ ३२ ॥ किंतु राजन्! कुरुनन्दन! दसवें दिन भीष्मने अपनी शक्तिका परिचय देते हुए लाखों पाण्डव-सैनिकोंका संहार कर डाला ॥ ३२ ॥
पञ्चालानां च ये श्रेष्ठा राजपुत्रा महारथाः । तेषामादत्त तेजांसि जलं सूर्य इवांशुभिः ॥ ३३ ॥ जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा धरतीका जल सोख लेते हैं, उसी प्रकार भीष्मजीने पांचालोंमें जो श्रेष्ठ महारथी राजकुमार थे, उन सबके तेज हर लिये ॥ ३३ ॥
हत्वा दश सहस्राणि कुञ्जराणां तरस्विनाम् । सारोहाणां महाराज हयानां चायुतं तथा ॥ ३४ ॥ पूर्णे शतसहस्रे द्वे पादातानां नरोत्तमः । प्रजज्वाल रणे भीष्मो विधूम इव पावकः ॥ ३५ ॥ महाराज! सवारोंसहित दस हजार वेगशाली हाथियों, उतने ही घोड़ों और घुड़सवारों तथा दो लाख पैदल सैनिकोंको नरश्रेष्ठ भीष्मने रणभूमिमें धूमरहित अग्निकी भाँति फूँक डाला ॥ ३४-३५ ॥
न चैनं पाण्डवेयानां केचिच्छेकुर्निरीक्षितुम् । उत्तरं मार्गमास्थाय तपन्तमिव भास्करम् ॥ ३६ ॥ उत्तरायणका आश्रय लेकर तपते हुए सूर्यकी भाँति प्रतापी भीष्मकी ओर पाण्डवोंमेंसे कोई देखनेमें समर्थ न हो सके ॥ ३६ ॥
ते पाण्डवेयाः संरब्धा महेष्वासेन पीडिताः । वधायाभ्यद्रवन् भीष्मं सृञ्जयाश्च महारथाः ॥ ३७ ॥ महाधनुर्धर भीष्मके बाणोंसे पीड़ित हो अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए पाण्डव तथा सृंजय महारथी भीष्मके वधके लिये उनपर टूट पड़े ॥ ३७ ॥
संयुद्ध्यमानो बहुभिर्भीष्मः शान्तनवस्तथा । अवकीर्णो महामेरुः शैलो मेघैरिवावृतः ॥ ३८ ॥ बहुत-से योद्धाओंके साथ अकेले युद्ध करते हुए शान्तनुनन्दन भीष्म उस समय बाणोंसे आच्छादित हो मेघोंके समूहसे आवृत हुए महान् पर्वत मेरुकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३८ ॥
पुत्रास्तु तव गाङ्गेयं समन्तात् पर्यवारयन् ।