भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2231

सुदक्षिणो महाराज काम्बोजः प्रत्यवारयत् ।। १५ ।।
महाराज! भीष्मके रथकी ओर अग्रसर होनेवाले अभिमन्युको काम्बोजराज सुदक्षिणने रोका ।। १५ ।।
विराटद्रुपदौ वृद्धौ समेतावरिमर्दनौ ।
अश्वत्थामा ततः क्रुद्धौ वारयामास भारत ।। १६ ।।
भारत! एक साथ आये हुए शत्रुमर्दन बूढ़े नरेश विराट और द्रुपदको क्रोधमें भरे हुए अश्वत्थामाने रोक दिया ।।
तथा पाण्डुसुतं ज्येष्ठं भीष्मस्य वधकाङ्क्षिणम् ।
भारद्वाजो रणे यत्तो धर्मपुत्रमवारयत् ।। १७ ।।
भीष्मके वधकी अभिलाषा रखनेवाले ज्येष्ठ पाण्डव धर्मपुत्र युधिष्ठिरको युद्धमें द्रोणाचार्यने यत्नपूर्वक रोका ।। १७ ।।
अर्जुनं रभसं युद्धे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ।
भीष्मप्रेप्सुं महाराज भासयन्तं दिशो दश ।। १८ ।।
दुःशासनो महेष्वासो वारयामास संयुगे ।
महाराज! दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए वेगशाली वीर अर्जुन युद्धमें शिखण्डीको आगे करके भीष्मको मारना चाहते थे। उस समय महाधनुर्धर दुःशासनने युद्धके मैदानमें आकर उन्हें रोका ।। १८ १/२ ।।
अन्ये च तावका योधाः पाण्डवानां महारथान् ।। १९ ।।
भीष्मस्याभिमुखान् यातान् वारयामासुराहवे ।
राजन्! इसी प्रकार आपके अन्य योद्धाओंने भीष्मके सम्मुख गये हुए पाण्डव महारथियोंको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। १९ १/२ ।।
धृष्टद्युम्नस्तु सैन्यानि प्राक्रोशत् पुनः पुनः ।। २० ।।
अभिद्रवत संरब्धा भीष्ममेकं महाबलम् ।
एषोऽर्जुनो रणे भीष्मं प्रयाति कुरुनन्दनः ।। २१ ।।
अभिद्रवत मा भैष्ट भीष्मो हि प्राप्स्यते न वः ।
अर्जुनं समरे योद्धुं नोत्सहेतापि वासवः ।। २२ ।।
किमु भीष्मो रणे वीरा गतसत्त्वोऽल्पजीवितः ।
धृष्टद्युम्न अपने सैनिकोंसे बारंबार पुकार-पुकारकर कहने लगे—‘वीरो! तुम सब लोग उत्साहित होकर एकमात्र महाबली भीष्मपर आक्रमण करो। ये कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले अर्जुन रणक्षेत्रमें भीष्मपर चढ़ाई करते हैं। तुम भी उनपर टूट पड़ो। डरो मत। भीष्म तुमलोगोंको नहीं पा सकेंगे। इन्द्र भी समरांगणमें अर्जुनके साथ युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हो सकते; फिर ये धैर्य और शक्तिसे शून्य भीष्म रणक्षेत्रमें उनका सामना कैसे कर सकते हैं? अब इनका जीवन थोड़ा ही शेष रहा है’ ।। २०—२२ १/२ ।।