महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2332, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद
संजय उवाच
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे जग्मुः स्वानालयान् पुनः ।
तूष्णीम्भूते महाराज भीष्मे शान्तनुनन्दने ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! शान्तनुनन्दन भीष्मके चुप हो जानेपर सब राजा वहाँसे उठकर अपने-अपने विश्रामस्थानको चले गये ॥ १ ॥
श्रुत्वा तु निहतं भीष्मं राधेयः पुरुषर्षभः ।
ईषदागतसंत्रासस्त्वरयोपजगाम ह ॥ २ ॥
भीष्मजीको रथसे गिराया गया सुनकर पुरुषप्रवर राधानन्दन कर्णके मनमें कुछ भय समा गया। वह बड़ी उतावलीके साथ उनके पास आया ॥ २ ॥
स ददर्श महात्मानं शरतल्पगतं तदा ।
जन्मशय्यागतं वीरं कार्तिकेयमिव प्रभुम् ॥ ३ ॥
उस समय उसने देखा, महात्मा भीष्म शरशय्यापर सो रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे वीरवर भगवान् कार्तिकेय जन्मकालमें शरशय्या (सरकण्डोंके बिछावन)-पर सोये थे ॥ ३ ॥
निमीलिताक्षं तं वीरं साश्रुकण्ठस्तदा वृषः ।
भीष्म भीष्म महाबाहो इत्युवाच महाद्युतिः ॥ ४ ॥
राधेयोऽहं कुरुश्रेष्ठ नित्यमक्षिगतस्तव ।
द्वेष्योऽहं तव सर्वत्र इति चैनमुवाच ह ॥ ५ ॥
वीर भीष्मके नेत्र बंद थे। उन्हें देखकर महातेजस्वी कर्णकी आँखोंमें आँसू छलक आये और अश्रुगद्गदकण्ठ होकर उसने कहा—'भीष्म! भीष्म! महाबाहो! कुरुश्रेष्ठ! मैं वही राधापुत्र कर्ण हूँ, जो सदा आपकी आँखोंमें गड़ा रहता था और जिसे आप सर्वत्र द्वेषदृष्टिसे देखते थे।' कर्णने यह बात उनसे कही ॥ ४-५ ॥
तच्छ्रुत्वा कुरुवृद्धो हि बली संवृतलोचनः ।
शनैरूद्धीक्ष्य सस्नेहमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
रहितं धिष्ण्यमालोक्य समुत्सार्य च रक्षिणः ।
पितेव पुत्रं गाङ्गेयः परिरभ्यैकपाणिना ॥ ७ ॥
उसकी बात सुनकर बंद नेत्रोंवाले बलवान् कुरुवृद्ध भीष्मने धीरेसे आँखें खोलकर देखा और उस स्थानको एकान्त देख पहरेदारोंको दूर हटाकर एक हाथसे कर्णका उसी