महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 286, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंशौर्यं च चित्रभाष्यं च दशैमे स्वर्गयोनयः ॥ ५९ ॥ सत्य, विनयकी मुद्रा, शास्त्रज्ञान, विद्या, कुलीनता, शील, बल, धन, शूरता और चमत्कारपूर्ण बात कहना—ये दस स्वर्गके हेतु हैं ॥ ५९ ॥ पापं कुर्वन् पापकीर्तिः पापमेवाश्नुते फलम् । पुण्यं कुर्वन् पुण्यकीर्तिः पुण्यमत्यन्तमश्नुते ॥ ६० ॥ पापकीर्तिवाला निन्दित मनुष्य पापाचरण करता हुआ पापके फलको ही प्राप्त करता है और पुण्य कीर्तिवाला (प्रशंसित) मनुष्य पुण्य करता हुआ अत्यन्त पुण्यफलका ही उपभोग करता है ॥ ६० ॥ तस्मात् पापं न कुर्वीत पुरुषः शंसितव्रतः । पापं प्रज्ञां नाशयति क्रियमाणं पुनः पुनः ॥ ६१ ॥ इसलिये प्रशंसित व्रतका आचरण करनेवाले पुरुषको पाप नहीं करना चाहिये; क्योंकि बारंबार किया हुआ पाप बुद्धिको नष्ट कर देता है ॥ ६१ ॥ नष्टप्रज्ञः पापमेव नित्यमारभते नरः । पुण्यं प्रज्ञां वर्धयति क्रियमाणं पुनः पुनः ॥ ६२ ॥ जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वह मनुष्य सदा पाप ही करता रहता है। इसी प्रकार बारंबार किया हुआ पुण्य बुद्धिको बढ़ाता है ॥ ६२ ॥ वृद्धप्रज्ञः पुण्यमेव नित्यमारभते नरः । पुण्यं कुर्वन् पुण्यकीर्तिः पुण्यं स्थानं स्म गच्छति । तस्मात् पुण्यं निषेवेत पुरुषः सुसमाहितः ॥ ६३ ॥ जिसकी बुद्धि बढ़ जाती है, वह मनुष्य सदा पुण्य ही करता है। इस प्रकार पुण्यकर्मा मनुष्य पुण्य करता हुआ पुण्यलोकको ही जाता है। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सदा एकाग्रचित्त होकर पुण्यका ही सेवन करे ॥ ६३ ॥ असूयको दन्दशूको निष्ठुरो वैरकृच्छठः । स कृच्छ्रं महदाप्नोति न चिरात् पापमाचरन् ॥ ६४ ॥ गुणोंमें दोष देखनेवाला, मर्मपर आघात करने-वाला, निर्दयी, शत्रुता करनेवाला और शठ मनुष्य पापका आचरण करता हुआ शीघ्र ही महान् कष्टको प्राप्त होता है ॥ ६४ ॥ अनसूयुः कृतप्रज्ञः शोभनान्याचरन् सदा । न कृच्छ्रं महदाप्नोति सर्वत्र च विरोचते ॥ ६५ ॥ दोषदृष्टिसे रहित शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष सदा शुभकर्मोंका अनुष्ठान करता हुआ महान् सुखको प्राप्त होता है और सर्वत्र उसका सम्मान होता है ॥ ६५ ॥ प्रज्ञामेवागमयति यः प्राज्ञेभ्यः स पण्डितः । प्राज्ञो ह्यावाप्य धर्मार्थौ शक्नोति सुखमेधितुम् ॥ ६६ ॥