महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 373, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मैव विद्वांस्तेन चाभ्येति सर्वं नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ॥ २४ ॥ राजन्! सकाम पुरुष अपने पुण्यकर्मोंके द्वारा नाशवान् लोकोंको ही प्राप्त करते हैं; किंतु जो ब्रह्मको जाननेवाला विद्वान् है, वही उस ज्ञानके द्वारा सर्वरूप परमात्माको प्राप्त होता है। मोक्षके लिये ज्ञानके सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं है ॥ २४ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो कृष्णमथाञ्जनं काद्रवं वा । सद्ब्रह्मणः पश्यति योऽत्र विद्वान् कथं रूपं तदमृतमक्षरं पदम् ॥ २५ ॥ धृतराष्ट्र बोले—विद्वान् पुरुष यहाँ सत्यस्वरूप परमात्माके जिस अमृत एवं अविनाशी परमपदका साक्षात्कार करते हैं, उसका रूप कैसा है? क्या वह सफेद-सा, लाल-सा, काजल-सा काला या सुवर्ण-जैसे पीले रंगका प्रतीत होता है? ॥ २५ ॥
सनत्सुजात उवाच
आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो कृष्णमायसमर्कवर्णम् । न पृथिव्यां तिष्ठति नान्तरिक्षे नैतत् समुद्रे सलिलं बिभर्ति ॥ २६ ॥ सनत्सुजातने कहा—यद्यपि श्वेत, लाल, काले, लोहेके सदृश अथवा सूर्यके समान प्रकाशमान अनेकों प्रकारके रूप प्रतीत होते हैं, तथापि ब्रह्मका वास्तविक रूप न पृथ्वीमें है, न आकाशमें। समुद्रका जल भी उस रूपको नहीं धारण करता ॥ २६ ॥
न तारकासु न च विद्युदाश्रितं न चाभ्रेषु दृश्यते रूपमस्य । न चापि वायौ न च देवतासु नैतच्चन्द्रे दृश्यते नोत सूर्ये ॥ २७ ॥ इस ब्रह्मका वह रूप न तारोंमें है, न बिजलीके आश्रित है और न बादलोंमें ही दिखायी देता है। इसी प्रकार वायु, देवगण, चन्द्रमा और सूर्यमें भी वह नहीं देखा जाता ॥
नैवर्क्षु तन्न यजुष्षु नाप्यथर्वसु न दृश्यते वै विमलेषु सामसु । रथन्तरे बार्हद्रथे वापि राजन् महाव्रते नैव दृश्येद् ध्रुवं तत् ॥ २८ ॥