महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 381, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेखने और पीनेवाले लोग उसीमें गोता लगाते रहते हैं। इससे मुक्त करनेवाले उस सनातन परमात्माका योगीजन साक्षात्कार करते हैं ॥ ७ ॥
तदर्धमासं पिबति संचित्य भ्रमरो मधु । ईशानः सर्वभूतेषु हविर्भूतमकल्पयत् । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ८ ॥
जैसे शहदकी मक्खी आधे मासतक शहदका संग्रह करके फिर आधे मासतक उसे पीती रहती है, उसी प्रकार यह भ्रमणशील संसारी जीव इस जन्ममें किये हुए संचित कर्मको परलोकमें (विभिन्न योनियोंमें) भोगता है। परमात्माने समस्त प्राणियोंके लिये उनके कर्मानुसार कर्मफलभोगरूप हविकी अर्थात् समस्त भोग-पदार्थोंकी व्यवस्था कर रखी है। उस सनातन भगवान्का योगीलोग साक्षात्कार करते हैं ॥ ८ ॥
हिरण्यपर्णमश्वत्थमभिपद्य ह्यपक्षकाः । ते तत्र पक्षिणो भूत्वा प्रपतन्ति यथा दिशम् । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ९ ॥
जिसके विषयरूपी पत्ते स्वर्णके समान मनोरम दिखायी पड़ते हैं, उस संसाररूपी अश्वत्थवृक्षपर आरूढ़ होकर पंखहीन जीव कर्मरूपी पंख धारणकर अपनी वासनाके अनुसार विभिन्न योनियोंमें पड़ते हैं अर्थात् एक योनिसे दूसरी योनिमें गमन करते हैं; किंतु योगीजन उस सनातन परमात्माका साक्षात्कार करते हैं ॥ ९ ॥
पूर्णात् पूर्णान्युद्धरन्ति पूर्णात् पूर्णानि चक्रिरे । हरन्ति पूर्णात् पूर्णानि पूर्णमेवावशिष्यते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ १० ॥
पूर्ण परमेश्वरसे पूर्ण—चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं, पूर्ण सत्ता-स्फूर्ति पाकर ही वे पूर्ण प्राणी चेष्टा करते हैं, फिर पूर्णसे ही पूर्णब्रह्ममें उनका उपसंहार (विलय) होता है तथा अन्तमें एकमात्र पूर्णब्रह्म ही शेष रह जाता है। उस सनातन परमात्माका योगीलोग साक्षात्कार करते हैं ॥ १० ॥
तस्माद् वै वायुरायातस्तस्मिंश्च प्रयतः सदा । तस्मादग्निश्च सोमश्च तस्मिंश्च प्राण आततः ॥ ११ ॥
उस पूर्णब्रह्मसे ही वायुका आविर्भाव हुआ है और उसीमें वह चेष्टा करता है। उसीसे अग्नि और सोमकी उत्पत्ति हुई है तथा उसीमें यह प्राण विस्तृत हुआ है ॥
सर्वमेव ततो विद्यात् तत् तद् वक्तुं न शक्नुमः । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ १२ ॥