महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 495, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअधर्म्ये चायशस्ये वा कार्ये महति दारुणे ।। पाण्डवैर्विग्रहस्तात सर्वथा मे न रोचते ।। ) 'तुम ऐसे कार्यके लिये दुराग्रह करते हो, जो समस्त भूमण्डलका विनाश करनेवाला है। यह अधर्मकारक तो है ही, अपयशकी भी वृद्धि करनेवाला है; इसके सिवा यह अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्म है। तात! तुम्हारा पाण्डवोंके साथ युद्ध छेड़ना मुझे किसी भी तरह अच्छा नहीं लग रहा है।
आत्मजेषु परं स्नेहं सर्वभूतानि कुर्वते । प्रियाणि चैषां कुर्वन्ति यथाशक्ति हितानि च ॥ ६ ॥ 'संसारके समस्त प्राणी अपने पुत्रोंपर अत्यन्त स्नेह करते हैं तथा अपनी शक्तिके अनुसार इनका प्रिय एवं हितसाधन करते हैं ।। ६ ।।
एवमेवोपकर्तॄणां प्रायशो लक्षयामहे । इच्छन्ति बहुलं सन्तः प्रतिकर्तुं महत् प्रियम् ।। ७ ।। 'इसी प्रकार प्रायः यह भी देखता हूँ कि साधु पुरुष उपकारी मनुष्योंके उपकारका बदला चुकानेके लिये उनका बारंबार महान् प्रिय कार्य करना चाहते हैं ।।
अग्निः साचिव्यकर्ता स्यात् खाण्डवे तत्कृतं स्मरन् । अर्जुनस्यापि भीमेऽस्मिन् कुरुपाण्डुसमागमे ।। ८ ।। 'कौरव-पाण्डवोंके इस भयंकर संग्राममें अग्निदेव भी खाण्डववनमें अर्जुनके किये हुए उपकारको याद करके उनकी सहायता अवश्य करेंगे ।। ८ ।।
जातिगृद्ध्याभिपन्नाश्च पाण्डवानामेकशः । धर्मादयः समेष्यन्ति समाहूता दिवौकसः ॥ ९ ॥ 'इसके सिवा पाण्डवोंका जन्म अनेक देवताओंसे हुआ है, इसलिये वे धर्म आदि देवता युधिष्ठिर आदिके बुलानेपर उनकी सहायताके लिये अवश्य पधारेंगे ।। ९ ।।
भीष्मद्रोणकृपादीनां भयादशनिसंनिभम् । रिरक्षिषन्तः संरम्भं गमिष्यन्तीति मे मतिः ।। १० ।। 'भीष्म, द्रोण और कृप आदिके भयसे पाण्डवोंकी रक्षा चाहते हुए देवतालोग भीष्म आदिपर वज्रके समान भयंकर क्रोध करेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है ।। १० ।।
ते देवैः सहिताः पार्था न शक्याः प्रतीवीक्षितुम् । मानुषेण नरव्याघ्रा वीर्यवन्तोऽस्त्रपारगाः ।। ११ ।। 'नरश्रेष्ठ पाण्डव अस्त्रविद्याके पारंगत और पराक्रमी तो हैं ही, देवताओंका सहयोग भी प्राप्त कर चुके हैं; अतः कोई मनुष्य उनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता ।। ११ ।।
दुरासदं यस्य दिव्यं गाण्डीवं धनुरुत्तमम् । वारुणौ चाक्षयौ दिव्यौ शरपूर्णौ महेषुधी ।। १२ ।।