महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 540, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें(भगवद्यानपर्व)
द्विसप्ततितमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप
वैशम्पायन उवाच
संजये प्रतियाते तु धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
(अर्जुनं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ च भारत ।
विराटद्रुपदौ चैव केकयानां महारथान् ॥
अब्रवीदुपसङ्गम्य शङ्खचक्रगदाधरम् ॥
अभियाचामहे गत्वा प्रयातुं कुरुसंसदम् ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! इधर संजयके चले जानेपर धर्मराज युधिष्ठिरने भीमसेन, अर्जुन, माद्रीकुमार नकुल-सहदेव, विराट, द्रुपद तथा केकयदेशीय महारथियोंके पास जाकर कहा—'हमलोग शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके पास चलकर उनसे कौरवसभामें जानेके लिये प्रार्थना करें'।
यथा भीष्मेण द्रोणेन बाह्लीकेन च धीमता ॥
अन्यैश्च कुरुभिः सार्धं न युध्येमहि संयुगे ।
‘वे वहाँ जाकर ऐसा प्रयत्न करें, जिससे हमें भीष्म, द्रोण, बुद्धिमान् बाह्लीक तथा अन्य कुरुवंशियोंके साथ रणक्षेत्रमें युद्ध न करना पड़े।
एष नः प्रथमः कल्प एतन्नः श्रेय उत्तमम् ॥
एवमुक्ताः सुमनसस्तेऽभिजग्मुर्जनार्दनम् ।
‘यही हमारा पहला ध्येय है और यही हमारे लिये परम कल्याणकी बात है।’ राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर वे सब लोग प्रसन्नचित्त होकर भगवान् श्रीकृष्णके समीप गये।
पाण्डवैः सह राजानो मरुत्वन्तमिवामराः ॥
तदा च दुःसहाः सर्वे सदस्यास्ते नरर्षभाः ।
उस समय शत्रुओंके लिये दुःसह प्रतीत होनेवाले वे सभी नरश्रेष्ठ सभासद् भूपालगण पाण्डवोंके साथ श्रीकृष्णके निकट उसी प्रकार गये, जैसे देवता इन्द्रके पास जाते हैं।