महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 647, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेन सत्येन कृष्ण त्वां हतामित्रं श्रिया वृतम् । अस्माद् विमुक्तं संग्रामात् पश्येयं पाण्डवैः सह ॥ ६१ ॥ नैव शक्याः पराजेतुं सर्वं ह्येषां तथाविधम् । 'श्रीकृष्ण! मेरे मनमें पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंके प्रति कभी भेदभाव नहीं था। इस सत्यके प्रभावसे निश्चय ही मैं देखूँगी कि तुम भावी संग्राममें शत्रुओंको मारकर पाण्डवोंसहित संकटसे मुक्त हो गये तथा राज्यलक्ष्मीने तुमलोगोंका ही वरण किया है। पाण्डवोंमें ऐसे सभी गुण मौजूद हैं, जिनके ही कारण शत्रु इन्हें परास्त नहीं कर सकते ॥ ६१ १/२ ॥
पितरं त्वेव गर्हेयं नात्मानं न सुयोधनम् ॥ ६२ ॥ येनाहं कुन्तिभोजाय धनं वृत्तेरिवार्पिता । 'मैं जो कष्ट भोग रही हूँ, इसके लिये न अपनेको दोष देती हूँ, न दुर्योधनको; अपितु पिताकी ही निन्दा करती हूँ, जिन्होंने मुझे राजा कुन्तिभोजके हाथमें उसी प्रकार दे दिया, जैसे विख्यात दानी पुरुष याचकको साधारण धन देते हैं ॥ ६२ १/२ ॥
बालां मामार्यकस्तुभ्यं क्रीडन्तीं कन्दुहस्तिकाम् ॥ ६३ ॥ अदात् तु कुन्तिभोजाय सखा सख्ये महात्मने । 'मैं अभी बालिका थी, हाथमें गेंद लेकर खेलती फिरती थी; उसी अवस्थामें तुम्हारे पितामहने मित्रधर्मका पालन करते हुए अपने सखा महात्मा कुन्तिभोजके हाथमें मुझे दे दिया ॥ ६३ १/२ ॥
साहं पित्रा च निकृता श्वशुरैश्च परंतप । अत्यन्तदुःखिता कृष्ण किं जीवितफलं मम ॥ ६४ ॥ 'परंतप श्रीकृष्ण! इस प्रकार मेरे पिता तथा श्वशुरोंने भी मेरे साथ वंचनापूर्ण बर्ताव किया है। इससे मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। मेरे जीवित रहनेसे क्या लाभ? ॥ ६४ ॥
यन्मां वागब्रवीन्नक्तं सूतके सव्यसाचिनः । पुत्रस्ते पृथिवीं जेता यशश्चास्य दिवं स्पृशेत् ॥ ६५ ॥ हत्वा कुरून् महाजन्ये राज्यं प्राप्य धनंजयः । भ्रातृभिः सह कौन्तेयस्त्रीन् मेधानाहरिष्यति ॥ ६६ ॥ 'अर्जुनके जन्मकालमें जब मैं सूतिकागृहमें थी, उस रात्रिमें आकाशवाणीने मुझसे यह कहा था—'भद्रे! तेरा यह पुत्र सारी पृथ्वीको जीत लेगा। इसका यश स्वर्गलोक-तक फैल जायगा। यह महान् संग्राममें कौरवोंका संहार करके राज्यपर अधिकार कर लेगा, फिर अपने भाइयोंके साथ तीन अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान करेगा' ॥ ६५-६६ ॥
नाहं तामभ्यसूयामि नमो धर्माय वेधसे । कृष्णाय महते नित्यं धर्मो धारयति प्रजाः ॥ ६७ ॥