भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 646, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 646

'श्रीकृष्ण! परम बुद्धिमान् गम्भीरस्वभाव महात्मा विदुरका शील ही आभूषण है, जो

सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त (विख्यात) करके स्थित है' ।। ५४ ।।

वैशम्पायन उवाच

सा शोकार्ता च हृष्टा च दृष्ट्वा गोविन्दमागतम् ।

नानाविधानि दुःखानि सर्वाण्येवान्वकीर्तयत् ।। ५५ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! श्रीकृष्णको आया हुआ देख कुन्तीदेवी

शोकातुर तथा आनन्दित हो अपने ऊपर आये हुए नाना प्रकारके सम्पूर्ण दुःखोंका पुनः

वर्णन करने लगीं— ।। ५५ ।।

पूर्वैराचरितं यत् तत् कुराजभिररिंदम ।

अक्षद्यूतं मृगवधः कच्चिदेषां सुखावहम् ।। ५६ ।।

'शत्रुदमन श्रीकृष्ण! पहलेके दुष्ट राजाओंने जो जूआ और शिकारकी परिपाटी चला दी

है, वह क्या इन सबके लिये सुखावह सिद्ध हुई है? (अपितु कदापि नहीं)।। ५६ ।।

तन्मां दहति यत् कृष्णा सभायां कुरुसंनिधौ ।

धार्तराष्ट्रैः परिक्लिष्टा यथा न कुशलं तथा ।। ५७ ।।

'सभामें कौरवोंके समीप धृतराष्ट्रके पुत्रोंने द्रौपदीको जो ऐसा कष्ट पहुँचाया है, जिससे

किसीका मंगल नहीं हो सकता, वह अपमान मेरे हृदयको दग्ध करता रहता है ।। ५७ ।।

निर्वासनं च नगरात् प्रव्रज्या च परंतप ।

नानाविधानां दुःखानामभिज्ञास्मि जनार्दन ।। ५८ ।।

'परंतप जनार्दन! पाण्डवोंका नगरसे निकाला जाना तथा उनका वनमें रहनेके लिये

बाध्य होना आदि नाना प्रकारके दुःखोंका मैं अनुभव कर चुकी हूँ ।। ५८ ।।

अज्ञातचर्या बालानामवरोधश्च माधव ।

न मे क्लेशतमं तत् स्यात् पुत्रैः सह परंतप ।। ५९ ।।

'परंतप माधव! मेरे बालकोंको अज्ञातभावसे रहना पड़ा है और अब राज्य न मिलनेसे

उनकी जीविकाका भी अवरोध हो गया है। पुत्रोंके साथ मुझे इतना महान् क्लेश नहीं प्राप्त

होना चाहिये ।। ५९ ।।

दुर्योधनेन निकृता वर्षमद्य चतुर्दशम् ।

दुःखादपि सुखं नः स्याद् यदि पुण्यफलक्षयः ।। ६० ।।

'दुर्योधनने मेरे पुत्रोंको कपटद्यूतके द्वारा राज्यसे वंचित कर दिया। उन्हें इस दुरवस्थामें

रहते आज चौदहवाँ वर्ष बीत रहा है। यदि सुख भोगनेका अर्थ है पुण्यके फलका क्षय होना,

तब तो पापके फलस्वरूप दुःख भोग लेनेके कारण अब हमें भी दुःखके बाद सुख मिलना

ही चाहिये ।। ६० ।।

न मे विशेषो जात्वासीद् धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवैः ।