भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 645

‘हाय! जो महाधनुर्धर, शूरवीर, युद्धकुशल तथा अग्नितुल्य तेजस्वी पाँच पतियोंसे युक्त है, वह द्रुपदकुमारी कृष्णा भी दुःखभागिनी हो गयी।। ४६।। चतुर्दशमिदं वर्षं यन्नापश्यमरिंदम। पुत्रादिभिः परिद्यूनां द्रौपदीं सत्यवादिनीम्॥ ४७॥ ‘शत्रुदमन! यह चौदहवाँ वर्ष बीत रहा है। इतने दिनोंसे मैंने पुत्रोंके बिछोहसे संतप्त हुई सत्यवादिनी द्रौपदीको नहीं देखा है।। ४७।। न नूनं कर्मभिः पुण्यैरश्नुते पुरुषः सुखम्। द्रौपदी चेत् तथावृत्ता नाश्नुते सुखमव्ययम्॥ ४८॥ ‘यदि वैसे सदाचार और सत्कर्मोंसे युक्त द्रुपदकुमारी अक्षय सुख नहीं पा रही है, तब तो निश्चय ही यह कहना पड़ेगा कि मनुष्य पुण्यकर्मोंसे सुख नहीं पाता है।। ४८।। न प्रियो मम कृष्णाया बीभत्सुर्न युधिष्ठिरः। भीमसेनो यमौ वापि यदपश्यं सभागताम्॥ ४९॥ न मे दुःखतरं किंचिद् भूतपूर्वं ततोऽधिकम्। ‘युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव भी मुझे द्रौपदीसे अधिक प्रिय नहीं हैं। उसी द्रौपदीको मैंने भरी सभामें लायी गयी देखा, उससे बढ़कर महान् दुःख मुझे पहले कभी नहीं हुआ था।। ४९ १/२ ।। स्त्रीधर्मिणीं द्रौपदीं यच्छ्वशुराणां समीपगाम्॥ ५०॥ आनायितामनार्येण क्रोधलोभानुवर्तिना। सर्वे प्रैक्षन्त कुरव एकवस्त्रां सभागताम्॥ ५१॥ ‘क्रोध और लोभके वशीभूत हुए दुष्ट दुर्योधनने रजस्वलावस्थामें एकवस्त्रधारिणी द्रौपदीको सभामें बुलवाया और उसे श्वशुरजनोंके समीप खड़ी कर दिया। उस समय सभी कौरवोंने उसे देखा था।। ५०-५१।। तत्रैव धृतराष्ट्रश्च महाराजश्च बाह्लिकः। कृपश्व सोमदत्तश्च निर्विण्णाः कुरवस्तथा॥ ५२॥ ‘वहीं राजा धृतराष्ट्र, महाराज बाह्लीक, कृपाचार्य, सोमदत्त तथा अन्यान्य कौरव खेदमें भरे हुए बैठे थे।। तस्यां संसदि सर्वेषां क्षत्तारं पूजयाम्यहम्। वृत्तेन हि भवत्यार्यो न धनेन न विद्यया॥ ५३॥ ‘मैं तो उस कौरवसभामें सबसे अधिक आदर विदुरजीको देती हूँ, (जिन्होंने द्रौपदीके प्रति किये जानेवाले अन्यायका प्रकटरूपमें विरोध किया था।) मनुष्य अपने सदाचारसे ही श्रेष्ठ होता है, धन और विद्यासे नहीं।। ५३।। तस्य कृष्ण महाबुद्धेर्गम्भीरस्य महात्मनः। क्षत्तुः शीलमलंकारो लोकान् विष्टभ्य तिष्ठति॥ ५४॥