भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 757

यहाँ सहस्रों नेत्रों, सहस्रों चरणों और सहस्रों मस्तकोंवाले एकमात्र अविनाशी श्रीमान् भगवान् विष्णु ही उन मायाविशिष्ट महेश्वरका साक्षात्कार करते हैं ।। अत्र राज्येन विप्राणां चन्द्रमाश्चाभ्यषिच्यत । अत्र गङ्गां महादेवः पतन्तीं गगनाच्च्युताम् ।। ८ ।। प्रतिगृह्य ददौ लोके मानुषे ब्रह्मवित्तम । उत्तर दिशामें ही चन्द्रमाका द्विजराजके पदपर अभिषेक हुआ था। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गालव! यहीं आकाशसे गिरती हुई गङ्गाको महादेवजीने अपने मस्तकपर धारण किया और उन्हें मनुष्यलोकमें छोड़ दिया ।। अत्र देव्या तपस्तप्तं महेश्वरपरीप्सया ।। ९ ।। अत्र कामश्च रोषश्च शैलश्चोमा च सम्बभुः । यहीं पार्वतीदेवीने भगवान् महेश्वरको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये कठोर तपस्या की थी और इसी दिशामें महादेवजीको मोहित करनेके लिये काम प्रकट हुआ। फिर उसके ऊपर भगवान् शंकरका क्रोध हुआ। उस अवसरपर गिरिराज हिमालय और उमा भी वहाँ विद्यमान थीं (इस प्रकार ये सब लोग वहाँ एक ही समयमें प्रकाशित हुए) ।। ९ १/२ ।। अत्र राक्षसयक्षाणां गन्धर्वाणां च गालव ।। १० ।। आधिपत्येन कैलासे धनदोऽप्यभिषेचितः । अत्र चैत्ररथं रम्यमत्र वैखानसाश्रमः ।। ११ ।। गालव! इसी दिशामें कैलास पर्वतपर राक्षस, यक्ष और गन्धर्वोंका आधिपत्य करनेके लिये धनदाता कुबेरका अभिषेक हुआ था। उत्तर दिशामें ही रमणीय चैत्ररथवन और वैखानस ऋषियोंका आश्रम है ।। १०-११ ।। अत्र मन्दाकिनी चैव मन्दरश्च द्विजर्षभ । अत्र सौगन्धिकवनं नैर्ऋतैरभिरक्ष्यते ।। १२ ।। द्विजश्रेष्ठ! यहीं मन्दाकिनी नदी और मन्दराचल हैं। इसी दिशामें राक्षसगण सौगन्धिकवनकी रक्षा करते हैं ।। १२ ।। शाद्वलं कदलीस्कन्धमत्र संतानका नगाः । अत्र संयमनित्यानां सिद्धानां स्वैरचारिणाम् ।। १३ ।। विमानान्यनुरूपाणि कामभोग्यानि गालव । यहीं हरी-हरी घासोंसे सुशोभित कदलीवन है और यहीं कल्पवृक्ष शोभा पाते हैं। गालव! इसी दिशामें सदा संयम-नियमका पालन करनेवाले स्वच्छन्दचारी सिद्धोंके इच्छानुसार भोगोंसे सम्पन्न एवं मनोनुकूल विमान विचरते हैं ।। १३ १/२ ।। अत्र ते ऋषयः सप्त देवी चारुन्धती तथा ।। १४ ।। अत्र तिष्ठति वै स्वातिरत्रास्या उदयः स्मृतः ।