महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 758, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसी दिशामें अरुन्धतीदेवी और सप्तर्षि प्रकाशित होते हैं। इसीमें स्वाती नक्षत्रका निवास है और यहीं उसका उदय होता है ॥ १४ १/२ ॥ अत्र यज्ञं समासाद्य ध्रुवं स्थाता पितामहः ॥ १५ ॥ ज्योतींषि चन्द्रसूर्यो च परिवर्तन्ति नित्यशः । इसी दिशामें ब्रह्माजी यज्ञानुष्ठानमें प्रवृत्त होकर नियमितरूपसे निवास करते हैं। नक्षत्र, चन्द्रमा तथा सूर्य भी सदा इसीमें परिभ्रमण करते हैं ॥ १५ १/२ ॥ अत्र गङ्गामहाद्वारं रक्षन्ति द्विजसत्तम ॥ १६ ॥ धामा नाम महात्मानो मुनयः सत्यवादिनः । न तेषां ज्ञायते मूर्तिर्नाकृतिर्न तपश्चितम् ॥ १७ ॥ परिवर्तसहस्राणि कामभोज्यानि गालव । द्विजश्रेष्ठ! इसी दिशामें धाम नामसे प्रसिद्ध सत्यवादी महात्मा मुनि श्रीगंगामहाद्वारकी रक्षा करते हैं। उनकी मूर्ति, आकृति तथा संचित तपस्याका परिमाण किसीको ज्ञात नहीं होता है। गालव! वे सहस्रों युगान्तकालतककी आयु इच्छानुसार भोगते हैं ॥ यथा यथा प्रविशति तस्मात् परतरं नरः ॥ १८ ॥ तथा तथा द्विजश्रेष्ठ प्रविलीयति गालव । नैतत् केनचिदन्येन गतपूर्वं द्विजर्षभ ॥ १९ ॥ ऋते नारायणं देवं नरं वा जिष्णुमव्ययम् । अत्र कैलासमित्युक्तं स्थानमैलविलस्य तत् ॥ २० ॥ द्विजश्रेष्ठ! मनुष्य ज्यों-ज्यों गंगामहाद्वारसे आगे बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे वहाँकी हिमराशिमें गलता जाता है। विप्रवर गालव! साक्षात् भगवान् नारायण तथा विजयशील अविनाशी महात्मा नरको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य पहले कभी गंगामहाद्वारसे आगे नहीं गया है। इसी दिशामें कैलासपर्वत है, जो कुबेरका स्थान बताया गया है ॥ १८—२० ॥ अत्र विद्युतप्रभा नाम जज्ञिरेऽप्सरसो दश । अत्र विष्णुपदं नाम क्रमता विष्णुना कृतम् ॥ २१ ॥ त्रिलोकविक्रमे ब्रह्मन्नुत्तरां दिशमाश्रितम् । अत्र राज्ञा मरुत्तेन यज्ञेनेष्टं द्विजोत्तम ॥ २२ ॥ उशीरबीजे विप्रर्षे यत्र जाम्बूनदं सरः । यहीं विद्युत्प्रभा नामसे प्रसिद्ध दस अप्सराएँ उत्पन्न हुई थीं। ब्रह्मन्! त्रिलोकीको नापते समय भगवान् विष्णुने इसी दिशामें अपना चरण रखा था। उत्तर दिशामें भगवान् विष्णुका वह चरणचिह्न (हरिकी पैड़ी) आज भी मौजूद है। द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मर्षे! उत्तर-दिशाके ही उशीरबीज नामक स्थानमें, जहाँ सुवर्णमय सरोवर है, राजा मरुत्तने यज्ञ किया था ॥ २१-२२ १/२ ॥ जीमूतस्यात्र विप्रर्षेरुपतस्थे महात्मनः ॥ २३ ॥