महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाक्षाद्धैमवतः पुण्यो विमलः कनकाकरः ।
इसी दिशामें ब्रह्मर्षि महात्मा जीमूतके समक्ष हिमालयकी पवित्र एवं निर्मल स्वर्णनिधि (सोनेकी खान) प्रकट हुई थी ।। २३ १/२ ।।
ब्राह्मणेषु च यत् कृत्स्नं स्वन्तं कृत्वा धनं महत् ।। २४ ।।
वव्रे धनं महर्षिः स जैमूतं तद् धनं ततः ।
उस सम्पूर्ण विशाल धनराशिको उन्होंने ब्राह्मणोंमें बाँटकर उसका सदुपयोग किया और ब्राह्मणोंसे यह वर माँगा कि यह धन मेरे नामसे प्रसिद्ध हो। इस कारण वह धन 'जैमूत' नामसे प्रसिद्ध हुआ ।। २४ १/२ ।।
अत्र नित्यं दिशाम्पालाः सायम्प्रातर्द्विजर्षभ ।। २५ ।।
कस्य कार्यं किमिति वै परिक्रोशन्ति गालव ।
विप्रवर गालव! यहाँ प्रतिदिन सबेरे और संध्याके समय सभी दिक्पाल एकत्र हो उच्च स्वरसे यह पूछते हैं कि किसको क्या काम है? ।। २५ १/२ ।।
एवमेषा द्विजश्रेष्ठ गुणैरन्यैर्दिगुत्तरा ।। २६ ।।
उत्तरेति परिख्याता सर्वकर्मसु चोत्तरा ।
द्विजश्रेष्ठ! इन सब कारणोंसे तथा अन्यान्य गुणोंके कारण यह दिशा उत्कृष्ट है और समस्त शुभ कर्मोंके लिये भी यही उत्तम मानी गयी है। इसलिये इसे उत्तर कहते हैं ।। २६ १/२ ।।
एता विस्तरशस्तात तव संकीर्तिता दिशः ।। २७ ।।
चतस्रः क्रमयोगेन कामाशां गन्तुमिच्छसि ।
तात! इस प्रकार मैंने क्रमशः चारों दिशाओंका तुम्हारे सामने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। कहो, किस दिशामें चलना चाहते हो? ।। २७ १/२ ।।
उद्यतोऽहं द्विजश्रेष्ठ तव दर्शयितुं दिशः ।
पृथिवीं चाखिलां ब्रह्मंस्तस्मादारोह मां द्विज ।। २८ ।।
द्विजश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सम्पूर्ण पृथ्वी तथा समस्त दिशाओंका दर्शन करानेके लिये उद्यत हूँ; अतः तुम मेरी पीठपर बैठ जाओ ।। २८ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। १११ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १११ ।।