भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 882

अथ त्वां पूजयिष्यामि हत्वा वै सर्वसैन्धवान् । अहं पश्यामि विजयं कृच्छ्रभावितमेव ते ॥ २१ ॥ जब तू सिन्धुदेशके समस्त योद्धाओंको मारकर आयेगा, उस समय मैं तेरा स्वागत करूँगी। मुझे विश्वास है कि बड़े कष्टसे प्राप्त होनेवाली तेरी विजय मैं अवश्य देखूँगी ॥ २१ ॥

पुत्र उवाच अकोशस्यासहायस्य कुतः सिद्धिर्जयो मम । इत्यवस्थां विदित्वैतामात्मनाऽऽत्मनि दारुणाम् ॥ २२ ॥ राज्याद् भावो निवृत्तो मे त्रिदिवादिव दुष्कृतेः । ईदृशं भवती कंचिदुपायमनुपश्यति ॥ २३ ॥ **पुत्र बोला—**माँ! मेरे पास न तो खजाना है और न सहायता करनेवाले सैनिक ही हैं, फिर मुझे विजयरूप अभीष्टकी सिद्धि कैसे प्राप्त होगी? अपनी इस दारुण अवस्थाके विषयमें स्वयं ही विचार करके मैंने राज्यकी ओरसे अपना अनुराग उसी प्रकार दूर हटा लिया है, जैसे स्वर्गकी ओरसे पापीका भाव हट जाता है। क्या तू ऐसा कोई उपाय देख रही है, जिससे मैं विजय पा सकूँ ॥

तन्मे परिणतप्रज्ञे सम्यक् प्रब्रूहि पृच्छते । करिष्यामि हि तत् सर्वं यथावदनुशासनम् ॥ २४ ॥ परिपक्व बुद्धिवाली माँ! मेरे इस प्रश्नके अनुसार तू कोई उत्तम उपाय बता दे। मैं तेरे सम्पूर्ण आदेशोंका यथोचित रीतिसे पालन करूँगा ॥ २४ ॥

मातोवाच पुत्र नात्मावमन्तव्यः पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । अभूत्वा हि भवन्त्यर्था भूत्वा नश्यन्ति चापरे । अमर्षेणैव चाप्यर्था नारब्धव्याः सुबालिशैः ॥ २५ ॥ **माता बोली—**बेटा! पहलेकी सम्पत्ति नष्ट हो गयी है—यह सोचकर तुझे अपनी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि धन-वैभव तो नष्ट होकर पुनः प्राप्त हो जाते हैं और प्राप्त होकर भी फिर नष्ट हो जाते हैं; अतः बुद्धिहीन पुरुषोंको ईर्ष्यावश ही धनकी प्राप्तिके लिये कर्मोंका आरम्भ नहीं करना चाहिये ॥ २५ ॥

सर्वेषां कर्मणां तात फले नित्यमनित्यता । अनित्यमिति जानन्तो न भवन्ति भवन्ति च ॥ २६ ॥ तात! सभी कर्मोंके फलमें सदा अनित्यता रहती है—कभी उनका फल मिलता है और कभी नहीं भी मिलता है। इस अनित्यताको जानते हुए भी बुद्धिमान् पुरुष कर्म करते हैं और वे कभी असफल होते हैं, तो कभी सफल भी हो जाते हैं ॥ २६ ॥