महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1297, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् एक महान् पर्वत बनकर खड़ा हुआ तो दूसरा वज्र बनकर उसपर टूट पड़ा ॥ ३० ॥
पुनः कुञ्जरशार्दूलौ पुनः स्वर्भानुभास्करौ । एवं मायाशतसृजावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ॥ ३१ ॥ भृशं चित्रमयुध्येतामलम्बुषघटोत्कचौ । फिर वे क्रमशः हाथी और सिंह तथा सूर्य और राहु बन गये। इस प्रकार वे अलम्बुष और घटोत्कच एक-दूसरेके वधकी इच्छासे सैकड़ों मायाओंकी सृष्टि करते हुए परस्पर अत्यन्त विचित्र युद्ध करने लगे ॥ ३१ १/२ ॥
परिघैश्च गदाभिश्च प्रासमुद्गरपट्टिशैः ॥ ३२ ॥ मुसलैः पर्वताग्रैश्च तावन्योन्यं विजघ्नतुः । वे दोनों निशाचर परिघ, गदा, प्रास, मुद्गर, पट्टिश, मुसल तथा पर्वतशिखरोंसे एक-दूसरेपर चोट करने लगे ॥ ३२ १/२ ॥
हयाभ्यां च गजाभ्यां च रथाभ्यां च पदातिभिः ॥ ३३ ॥ युयुधाते महामायौ राक्षसप्रवरौ युधि । उस युद्धस्थलमें वे महामायावी श्रेष्ठ राक्षस अपने हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदल सैनिकोंके द्वारा एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए युद्ध कर रहे थे ॥ ३३ १/२ ॥
ततो घटोत्कचो राजन्नलम्बुषवधेप्सया ॥ ३४ ॥ उत्पपात भृशं क्रुद्धः श्येनवन्निपपात च । राजन्! तदनन्तर घटोत्कच अलम्बुषके वधकी इच्छासे अत्यन्त कुपित होकर ऊपर उछला और जैसे बाज (चिड़ियापर) झपटता है, उसी प्रकार उसके ऊपर टूट पड़ा ॥ ३४ १/२ ॥
गृहीत्वा च महाकायं राक्षसेन्द्रमलम्बुषम् ॥ ३५ ॥ उद्यम्य न्यवधीद् भूमौ मयं विष्णुरिवाहवे । विशालकाय राक्षसराज अलम्बुषको दोनों हाथोंसे पकड़कर घटोत्कचने युद्धस्थलमें उसे उठाकर धरतीपर दे मारा, मानो भगवान् विष्णुने मयासुरको पछाड़ दिया हो ॥
ततो घटोत्कचः खड्गमुद्धृत्याद्भुतदर्शनम् ॥ ३६ ॥ रौद्रस्य कायाद्धि शिरो भीमं विकृतदर्शनम् । स्फुरतस्तस्य समरे नदतश्चातिभैरवम् ॥ ३७ ॥ निचकर्त महाराज शत्रोरमितविक्रमः ।