भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1301

जीभ और ओठ ताँबेके समान लाल और लम्बे थे, भौंहें बड़ी-बड़ी, नाक मोटी, शरीरका रंग काला, गर्दन लाल और शरीर पर्वताकार था। वह देखनेमें बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ ६ ॥
महाकायो महाबाहुर्महाशीर्षो महाबलः ।
विकृतः परुषस्पर्शो विकटोद्वृद्धपिण्डकः ॥ ७ ॥
उसकी देह, भुजा और मस्तक सभी विशाल थे। उसका बल भी महान् था। आकृति बेडौल थी। उसका स्पर्श कठोर था। उसकी पिंडलियाँ विकट एवं सुदृढ़ थीं ॥ ७ ॥
स्थूलस्फिग्गूढनाभिश्च शिथिलोपचयो महान् ।
तथैव हस्ताभरणी महामायोऽङ्गदी तथा ॥ ८ ॥
उसके नितम्बभाग स्थूल थे। उसकी नाभि छोटी होनेके कारण छिपी हुई थी। उसके शरीरकी बढ़ती रुक गयी थी। वह लंबे कदका था। उसने हाथोंमें आभूषण पहन रखे थे। भुजाओंमें बाजूबन्द धारण कर रखे थे। वह बड़ी-बड़ी मायाओंका जानकार था ॥ ८ ॥
उरसा धारयन् निष्कमग्निमालां यथाचलः ।
तस्य हेममयं चित्रं बहुरूपाङ्गशोभितम् ॥ ९ ॥
तोरणप्रतिमं शुभ्रं किरीटं मूर्ध्न्यशोभत ।