महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर वह महाकाय राक्षस धैर्यहीन एवं उत्साहशून्य-सा होकर रणभूमिमें आकाशसे सैकड़ों टुकड़ोंमें कटकर गिरा हुआ दिखायी दिया।। ६०१/२।।
तं हतं मन्यमानाः स्म प्राणदन् कुरुपुङ्गवाः ।। ६१ ।।
अथ देहैर्नवैर्नैर्दिक्षु सर्वासुवदृश्यत ।
उस समय उसे मरा हुआ मानकर कौरव-दलके प्रमुख वीर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। इतनेहीमें वह दूसरे बहुत-से नये-नये शरीर धारण करके सम्पूर्ण दिशाओंमें दिखायी देने लगा ।। ६११/२।।
पुनश्चापि महाकायः शतशीर्षः शतोदरः ।। ६२ ।।
व्यदृश्यत महाबाहुर्मैनाक इव पर्वतः ।
फिर वह बड़ी-बड़ी बाँहोंवाला एक ही विशालकाय रूप धारण करके मैनाक पर्वतके समान दृष्टिगोचर हुआ। उस समय उसके सौ मस्तक तथा सौ पेट हो गये थे ।। ६२१/२।।
अङ्गुष्ठमात्रो भूत्वा च पुनरेव स राक्षसः ।। ६३ ।।
सागरोर्मिरिवोद्भूतस्तिर्यगूर्ध्वमवर्तत ।
तत्पश्चात् वह राक्षस अँगूठेके बराबर होकर उछलती हुई समुद्रकी लहरके समान कभी ऊपर और कभी इधर-उधर होने लगा ।। ६३१/२।।
वसुधां दारयित्वा च पुनरप्सु न्यमज्जत ।। ६४ ।।
अदृश्यत तदा तत्र पुनरुन्मज्जितोऽन्यतः ।
फिर पृथ्वीको फाड़कर वह पानीमें डूब गया और दूसरी जगह पुनः जलसे ऊपर आकर दिखायी देने लगा ।। ६४१/२।।
सोऽवतीर्य पुनस्तस्थौ रथे हेमपरिष्कृते ।। ६५ ।।
क्षितिं खं च दिशश्चैव माययाभ्येत्य दंशितः ।
गत्वा कर्णरथाभ्याशं व्यचरत् कुण्डलाननः ।। ६६ ।।
इसके बाद आकाशसे उतरकर वह पुनः अपने सुवर्णमण्डित रथपर स्थित हो गया और मायासे ही पृथ्वी, आकाश एवं सम्पूर्ण दिशाओंमें घूमता हुआ कवचसे सुसज्जित हो कर्णके रथके समीप जाकर विचरने लगा। उस समय उसका मुख कुण्डलोंसे सुशोभित हो रहा था ।। ६५-६६ ।।
प्राह वाक्यमसम्भ्रान्तः सूतपुत्रं विशाम्पते ।
तिष्ठेदानीं क्व मे जीवन् सूतपुत्र गमिष्यसि ।। ६७ ।।
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ।
प्रजानाथ! अब घटोत्कच सम्भ्रमरहित हो सूतपुत्र कर्णसे बोला—‘सारथिके बेटे! खड़ा रह। अब तू मुझसे जीवित बचकर कहाँ जायगा? आज मैं समरांगणमें तेरा युद्धका हौसला मिटा दूँगा' ।। ६७१/२।।