महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1312, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ संधाय वायव्यमस्त्रमस्त्रविदां वरः ।। ७६ ।।
व्यधमत् कालमेघं तं कर्णो वैकर्तनो वृषः ।
तब अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वैकर्तन दानी कर्णने वायव्यास्त्रका संधान करके उस काले मेघको नष्ट कर दिया ।। ७६ १/२ ।।
स मार्गणगणैः कर्णो दिशः प्रच्छाद्य सर्वशः ।। ७७ ।।
जघानास्त्रं महाराज घटोत्कचसमीरितम् ।
महाराज! कर्णने अपने बाणसमूहोंद्वारा सारी दिशाओंको आच्छादित करके घटोत्कचद्वारा चलाये गये अस्त्रोंको काट डाला ।। ७७ १/२ ।।
ततः प्रहस्य समरे भौमसेनिर्महाबलः ।। ७८ ।।
प्रादुश्चक्रे महामायां कर्णं प्रति महारथम् ।
तब महाबली भीमसेनकुमारने जोर-जोरसे हँसकर समरभूमिमें महारथी कर्णके प्रति अपनी महामाया प्रकट की ।। ७८ १/२ ।।
स दृष्ट्वा पुनरायान्तं रथेन रथिनां वरम् ।। ७९ ।।
घटोत्कचमसम्भ्रान्तं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ।
सिंहशार्दूलसदृशैर्मत्तमातङ्गविक्रमैः ।। ८० ।।
उस समय कर्णने रथियोंमें श्रेष्ठ घटोत्कचको पुनः रथपर बैठकर आते देखा। उसके मनमें तनिक भी घबराहट नहीं थी। सिंह, शार्दूल और मतवाले गजराजके समान पराक्रमी बहुत-से राक्षस उसे घेरे हुए थे ।।
गजस्थैश्च रथस्थैश्च वाजिपृष्ठगतैस्तथा ।
नानाशस्त्रधरैर्घोरैर्नानाकवचभूषणैः ।। ८१ ।।
उन राक्षसोंमेंसे कुछ हाथियोंपर, कुछ रथोंपर और कुछ घोड़ोंकी पीठोंपर सवार थे। वे भयंकर निशाचर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र, कवच और आभूषण धारण किये हुए थे ।। ८१ ।।
वृतं घटोत्कचं क्रूरैर्मरुद्भिरिव वासवम् ।
दृष्ट्वा कर्णो महेष्वासो योधयामास राक्षसम् ।। ८२ ।।
देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रके समान क्रूर राक्षसोंसे आवृत घटोत्कचको सामने देखकर महाधनुर्धर कर्णने उस निशाचरके साथ युद्ध आरम्भ किया ।। ८२ ।।
घटोत्कचस्ततः कर्णं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः ।
ननाद भैरवं नादं भीषयन् सर्वपार्थिवान् ।। ८३ ।।
तदनन्तर घटोत्कचने कर्णको पाँच बाणोंसे घायल करके समस्त राजाओंको भयभीत करते हुए वहाँ भयानक गर्जना की ।। ८३ ।।
भूयश्चाञ्जलिकेनाथ सम्मार्गणगणं महत् ।
कर्णहस्तस्थितं चापं चिच्छेदाशु घटोत्कचः ।। ८४ ।।