महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1313, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् अंजलिक नामक बाण मारकर घटोत्कचने कर्णके हाथमें स्थित हुए विशाल धनुषको बाणसमूहोंसहित शीघ्र काट डाला ॥ ८४ ॥ अथान्यद् धनुरादाय दृढं भारसहं महत् । विचकर्ष बलात् कर्ण इन्द्रायुधमिवोच्छ्रितम् ॥ ८५ ॥ तब कर्णने भार सहन करनेमें समर्थ दूसरा विशाल, सुदृढ़ एवं इन्द्रधनुषके समान ऊँचा धनुष हाथमें लेकर उसे बलपूर्वक खींचा ॥ ८५ ॥ ततः कर्णो महाराज प्रेषयामास सायकान् । सुवर्णपुङ्खाञ्छत्रुघ्नान् खेचरान् राक्षसान् प्रति ॥ ८६ ॥ महाराज! तदनन्तर कर्णने उन आकाशचारी राक्षसोंको लक्ष्य करके सोनेके पंखवाले बहुत-से शत्रुनाशक बाण चलाये ॥ ८६ ॥ तद् बाणैरर्दितं यूथं रक्षसां पीनवक्षसाम् । सिंहेनेवार्दितं वन्यं गजानामाकुलं कुलम् ॥ ८७ ॥ उन बाणोंसे पीड़ित हुआ चौड़ी छातीवाले राक्षसोंका वह समूह सिंहके सताये हुए जंगली हाथियोंके झुंडकी भाँति व्याकुल हो उठा ॥ ८७ ॥ विधम्य राक्षसान् बाणैः साश्वसूतगजान् विभुः । ददाह भगवान् वह्निर्भूतानीव युगक्षये ॥ ८८ ॥ जैसे प्रलयकालमें भगवान् अग्निदेव सम्पूर्ण भूतोंको भस्म कर डालते हैं, उसी प्रकार शक्तिशाली कर्णने अपने बाणोंद्वारा घोड़े, सारथि और हाथियोंसहित उन राक्षसोंको संतप्त करके जला डाला ॥ ८८ ॥ स हत्वा राक्षसीं सेनां शुशुभे सूतनन्दनः । पुरेव त्रिपुरं दग्ध्वा दिवि देवो महेश्वरः ॥ ८९ ॥ जैसे पूर्वकालमें भगवान् महेश्वर आकाशमें त्रिपुरासुरका दाह करके सुशोभित हुए थे, उसी प्रकार उस राक्षस-सेनाका संहार करके सूतनन्दन कर्ण बड़ी शोभा पाने लगा ॥ ८९ ॥ तेषु राजसहस्रेषु पाण्डवेयेषु मारिष । नैनं निरीक्षितुमपि कश्चिच्छक्नोति पार्थिवः ॥ ९० ॥ माननीय नरेश! पाण्डवपक्षके सहस्रों राजाओंमेंसे कोई भी भूपाल उस समय कर्णकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता था ॥ ९० ॥ ऋते घटोत्कचाद् राजन् राक्षसेन्द्रान्महाबलात् । भीमवीर्यबलोपेतात् क्रुद्धाद् वैवस्वतादिव ॥ ९१ ॥ राजन्! क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान भयंकर बल-पराक्रमसे सम्पन्न महाबली राक्षसराज घटोत्कचको छोड़कर दूसरा कोई कर्णका सामना न कर सका ॥ ९१ ॥ तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां पावकः समजायत ।