भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1314, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1314

महोल्काभ्यां यथा राजन् सार्चिषः स्नेहबिन्दवः ॥ ९२ ॥ नरेश्वर! जैसे मशालोंसे जलती हुई तेलकी बूँदें गिरती हैं, उसी प्रकार क्रुद्ध हुए घटोत्कचके दोनों नेत्रोंसे आगकी चिनगारियाँ छूटने लगीं ॥ ९२ ॥

तलं तलेन संहत्य संदश्य दशनच्छदम् । रथमास्थाय च पुनर्मायया निर्मितं तदा ॥ ९३ ॥ युक्तं गजनिभैर्वाहैः पिशाचवदनैः खरैः । स सूतमब्रवीत् क्रुद्धः सूतपुत्राय मां वह ॥ ९४ ॥ उसने उस समय हाथसे हाथ मलकर, दाँतोंसे ओठ चबाकर, पुनः हाथी-जैसे बलवान् एवं पिशाचोंके-से मुखवाले प्रखर गधोंसे जुते हुए मायानिर्मित रथपर बैठकर अपने सारथिसे कहा—‘तुम मुझे सूतपुत्र कर्णके पास ले चलो’ ॥ ९३-९४ ॥

स ययौ घोररूपेण रथेन रथिनां वरः । द्वैरथं सूतपुत्रेण पुनरेव विशाम्पते ॥ ९५ ॥ प्रजानाथ! ऐसा कहकर रथियोंमें श्रेष्ठ घटोत्कच पुनः उस भयंकर रथके द्वारा सूतपुत्र कर्णके साथ द्वैरथ युद्ध करनेके लिये गया ॥ ९५ ॥

स चिक्षेप पुनः क्रुद्धः सूतपुत्राय राक्षसः । अष्टचक्रां महाघोरामशनिं रुद्रनिर्मिताम् ॥ ९६ ॥ द्वियोजनसमुत्सेधां योजनायामविस्तराम् । आयसीं निचितां शूलैः कदम्बमिव केसरैः ॥ ९७ ॥ उस राक्षसने कुपित होकर पुनः सूतपुत्र कर्णपर आठ चक्रोंसे युक्त एक अत्यन्त भयंकर रुद्रनिर्मित अशनि चलायी, जिसकी ऊँचाई दो योजन और लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी थी। लोहेकी बनी हुई उस शक्तिमें शूल चुने गये थे। इससे वह केसरोंसे युक्त कदम्ब-पुष्पके समान जान पड़ती थी ॥ ९६-९७ ॥

तामवप्लुत्य जग्राह कर्णो न्यस्य महद् धनुः । चिक्षेप चैनां तस्यैव स्यन्दनात् सोऽवपुप्लुवे ॥ ९८ ॥ कर्णने अपना विशाल धनुष नीचे रख दिया और उछलकर उस अशनिको हाथसे पकड़ लिया; फिर उसे घटोत्कचपर ही चला दिया। घटोत्कच शीघ्र ही उस रथसे कूद पड़ा ॥ ९८ ॥

साश्वसूतध्वजं यानं भस्म कृत्वा महाप्रभा । विवेश वसुधां भित्त्वा सुरास्तत्र विसिस्मियुः ॥ ९९ ॥ वह अतिशय प्रभापूर्ण अशनि घोड़े, सारथि और ध्वजसहित घटोत्कचके रथको भस्म करके धरती फाड़कर समा गयी। यह देख वहाँ खड़े हुए सब देवता आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ९९ ॥

कर्णं तु सर्वभूतानि पूजयामासुरोजसा ।