भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1361, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1361

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

कर्णने अर्जुनपर शक्ति क्यों नहीं छोड़ी, इसके उत्तरमें संजयका धृतराष्ट्रसे और श्रीकृष्णका सात्यकिसे रहस्ययुक्त कथन

धृतराष्ट्र उवाच

एकवीरवधे मोघा शक्तिः सूतात्मजे यदा ।
कस्मात् सर्वान् समुत्सृज्य स तां पार्थे न मुक्तवान् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! कर्णके पास जो शक्ति थी, वह यदि एक ही वीरका वध करके निष्फल हो जानेवाली थी तो उसने सबको छोड़कर अर्जुनपर ही उसका प्रहार क्यों नहीं किया? ॥ १ ॥

तस्मिन् हते हता हि स्युः सर्वे पाण्डवसृञ्जयाः ।
एकवीरवधे कस्माद् युद्धे न जयमादधे ॥ २ ॥
अर्जुनके मारे जानेपर समस्त सृंजय और पाण्डव अपने-आप नष्ट हो जाते। अतः एक वीर अर्जुनका ही वध करके उसने युद्धमें क्यों नहीं विजय प्राप्त की? ॥ २ ॥

आहूतो न निवर्तेयमिति तस्य महाव्रतम् ।
स्वयं मार्गयितव्यः स सूतपुत्रेण फाल्गुनः ॥ ३ ॥
अर्जुनका तो यह महान् व्रत ही है कि युद्धमें किसीके बुलानेपर मैं पीछे नहीं लौट सकता; ऐसी दशामें सूतपुत्र कर्णको स्वयं ही अर्जुनकी खोज करनी चाहिये थी ॥ ३ ॥

ततो द्वैरथमानीय फाल्गुनं शक्रदत्तया ।
जघान न वृषः कस्मात् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ४ ॥
संजय! इस प्रकार अर्जुनको द्वैरथयुद्धमें लाकर धर्मात्मा कर्णने इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे उन्हें क्यों नहीं मार डाला? यह मुझे बताओ ॥ ४ ॥

नूनं बुद्धिविहीनश्चाप्यसहायश्च मे सुतः ।
शत्रुभिर्व्यंसितः पापः कथं नु स जयेदरीन् ॥ ५ ॥
निश्चय ही मेरा पुत्र दुर्योधन बुद्धिहीन और असहाय है। शत्रुओंने उसे ठग लिया। अब वह पापी अपने शत्रुओंपर कैसे विजय पा सकता है? ॥ ५ ॥

या ह्यस्य परमा शक्तिर्जयस्य च परायणम् ।
सा शक्तिर्वासुदेवेन व्यंसिता च घटोत्कचे ॥ ६ ॥
जो इसकी सबसे बड़ी शक्ति और विजयका आधार-स्तम्भ थी, उस दिव्य शक्तिको घटोत्कचपर चलवाकर श्रीकृष्णने व्यर्थ कर दिया ॥ ६ ॥