भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1362

कुणेर्यथा हस्तगतं ह्रियेत् फलं बलीयसा । तथा शक्तिरमोघा सा मोघीभूता घटोत्कचे ॥ ७ ॥ जैसे कोई बलवान् पुरुष लुंजे (टूंँटे)-के हाथका फल छीन ले, उसी प्रकार श्रीकृष्णने उस अमोघ शक्तिको घटोत्कचपर चलवाकर अन्यत्रके लिये निष्फल कर दिया ॥ ७ ॥

यथा वराहस्य शुनश्च युध्यतो- स्तयोरभावे श्वपचस्य लाभः । मन्ये विद्वन् वासुदेवस्य तद्वद् युद्धे लाभः कर्णहैडिम्बयोर्वे ॥ ८ ॥ विद्वन्! जैसे सूअर और कुत्तेके आपसमें लड़नेपर उन दोनोंमेंसे किसीकी भी मृत्यु हो जाय तो चाण्डालको लाभ ही होता है, उसी प्रकार कर्ण और घटोत्कचके युद्धमें मैं वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णका ही लाभ हुआ मानता हूँ ॥ ८ ॥

घटोत्कचो यदि हन्याद्धि कर्णं परो लाभः स भवेत् पाण्डवानाम् । वैकर्तनो वा यदि तं निहन्यात् तथापि कृत्यं शक्तिनाशात् कृतं स्यात् ॥ ९ ॥ घटोत्कच यदि कर्णको मार देगा तो पाण्डवोंको बहुत बड़ा लाभ होगा और यदि वैकर्तन कर्ण घटोत्कचको मार डालेगा तो भी इन्द्रकी दी हुई शक्तिका नाश हो जानेसे उनका ही प्रयोजन सिद्ध होगा ॥ ९ ॥

इति प्राज्ञः प्रज्ञयैतद् विचिन्त्य घटोत्कचं सूतपुत्रेण युद्धे । अघातयद् वासुदेवो नृसिंहः प्रियं कुर्वन् पाण्डवानां हितं च ॥ १० ॥ मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने अपनी बुद्धिसे यही सोचकर पाण्डवोंका प्रिय तथा हित करते हुए युद्धमें सूतपुत्र कर्णके द्वारा घटोत्कचको मरवा दिया ॥ १० ॥

संजय उवाच

एतच्चिकीर्षितं ज्ञात्वा कर्णस्य मधुसूदनः । नियोजयामास तदा द्वैरथे राक्षसेश्वरम् ॥ ११ ॥ घटोत्कचं महावीर्यं महाबुद्धिर्जनार्दनः । अमोघाया विघातार्थं राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ १२ ॥ संजयने कहा— राजन्! कर्ण भी उस शक्तिसे अर्जुनका ही वध करना चाहता था। उसके इस अभिप्रायको जानकर परम बुद्धिमान् मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने उस अमोघ