महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1363, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशक्तिको नष्ट करनेके लिये ही कर्णके साथ द्वैरथ युद्धमें उस समय महापराक्रमी राक्षसराज घटोत्कचको लगाया। महाराज! यह सब आपकी कुमन्त्रणाका ही फल है ।। ११-१२ ।।
तदैव कृतकार्या हि वयं स्याम कुरूद्वह ।
न रक्षेद् यदि कृष्णस्तं पार्थं कर्णान्महारथात् ।। १३ ।।
कुरुश्रेष्ठ! यदि श्रीकृष्ण महारथी कर्णसे कुन्तीकुमार अर्जुनकी रक्षा न करते तो हमलोग उसी समय कृतकार्य हो गये होते ।। १३ ।।
साश्वध्वजरथः संख्ये धृतराष्ट्र पतेद् भुवि ।
विना जनार्दनं पार्थो योगानामीश्वरं प्रभुम् ।। १४ ।।
महाराज धृतराष्ट्र! यदि योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण न हों तो अर्जुन घोड़े, ध्वज और रथसहित निश्चय ही युद्धमें धराशायी हो जायँ ।। १४ ।।
तैस्तैरुपायैर्बहुभी रक्ष्यमाणः स पार्थिव ।
जयत्यभिमुखः शत्रून् पार्थः कृष्णेन पालितः ।। १५ ।।
राजन्! नाना प्रकारके विभिन्न उपायोंसे श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित रहकर ही अर्जुन सम्मुख युद्धमें शत्रुओंपर विजय पाते हैं ।। १५ ।।
स विशेषात् त्वमोघायाः कृष्णोऽरक्षत पाण्डवम् ।
हन्यात् क्षिप्रं हि कौन्तेयं शक्तिर्वृक्षमिवाशनिः ।। १६ ।।
श्रीकृष्णने विशेष प्रयत्न करके उस अमोघ शक्तिसे पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा की है, नहीं तो जैसे वज्र गिरकर वृक्षको भस्म कर देता है, उसी प्रकार वह शक्ति कुन्तीकुमार अर्जुनको शीघ्र ही नष्ट कर देती ।। १६ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
विरोधी च कुमन्त्री च प्राज्ञमानी ममात्मजः ।
यस्यैव समतिक्रान्तो वधोपायो जयं प्रति ।। १७ ।।
धृतराष्ट्रने कहा—संजय! मेरा पुत्र दुर्योधन सबका विरोधी और अपनेको ही सबसे अधिक बुद्धिमान् समझनेवाला है। उसके मन्त्री भी अच्छे नहीं हैं; इसीलिये अर्जुनके वध और विजय-लाभका यह अमोघ उपाय उसके हाथसे निकल गया है ।। १७ ।।
स वा कर्णो महाबुद्धिः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
न मुक्तवान् कथं सूत ताममोघां धनंजये ।। १८ ।।
सूत! समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण तो बड़ा बुद्धिमान् है; उसने स्वयं ही उस अमोघ शक्तिको अर्जुनपर कैसे नहीं छोड़ा? ।। १८ ।।
तवापि समतिक्रान्तमेतद् गावलगणे कथम् ।
एतमर्थं महाबुद्धे यत् त्वया नावबोधितः ।। १९ ।।