भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1364

परम बुद्धिमान् गवलगणकुमार! तुम्हारे ध्यानसे यह बात कैसे निकल गयी कि तुमने कर्णको इसके विषयमें कुछ नहीं समझाया ॥ १९ ॥

संजय उवाच

दुर्योधनस्य शकुनेर्मम दुःशासनस्य च ।
रात्रौ रात्रौ भवत्येषा नित्यमेव समर्थना ॥ २० ॥
श्वः सर्वसैन्यान्युत्सृज्य जहि कर्ण धनंजयम् ।
प्रेष्यवत् पाण्डुपाञ्चालानुपभोक्ष्यामहे ततः ॥ २१ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! प्रतिदिन रातको दुर्योधन, शकुनि और दुःशासनका तथा मेरा भी कर्णसे यही आग्रह रहता था कि 'कर्ण! कल सबेरे तुम सारी सेनाओंको छोड़कर अर्जुनको मार डालो। फिर तो पाण्डवों और पांचालोंका हम भृत्योंके समान उपभोग करेंगे ॥ २०-२१ ॥

अथवा निहते पार्थे पाण्डवान्यतमं ततः ।
स्थापयेद् यदि वार्ष्णेयस्तस्मात्कृष्णो हि हन्यताम् ॥ २२ ॥
'यदि ऐसा सोचो कि अर्जुनके मारे जानेपर श्रीकृष्ण दूसरे किसी पाण्डवको युद्धके लिये खड़ा कर लेंगे तो श्रीकृष्णको ही मार डालो ॥ २२ ॥

कृष्णो हि मूलं पाण्डूनां पार्थः स्कन्ध इवोद्गतः ।
शाखा इवेतरे पार्थाः पञ्चालाः पत्रसंज्ञिताः ॥ २३ ॥
'श्रीकृष्ण ही पाण्डवोंकी जड़ हैं, अर्जुन ऊपरके तनेके समान हैं, अन्य कुन्तीपुत्र शाखाएँ हैं तथा पांचाल सैनिक पत्तोंके समान हैं ॥ २३ ॥

कृष्णाश्रयाः कृष्णबलाः कृष्णनाथाश्च पाण्डवाः ।
कृष्णः परायणं चैषां ज्योतिषामिव चन्द्रमाः ॥ २४ ॥
'श्रीकृष्ण ही पाण्डवोंके आश्रय, बल और रक्षक हैं। जैसे नक्षत्रोंके परम आश्रय चन्द्रमा हैं, उसी प्रकार इन पाण्डवोंका सबसे बड़ा सहारा श्रीकृष्ण हैं ॥ २४ ॥

तस्मात् पर्णानि शाखाश्च स्कन्धं चोत्सृज्य सूतज ।
कृष्णं हि विद्धि पाण्डूनां मूलं सर्वत्र सर्वदा ॥ २५ ॥
'अतः सूतनन्दन! तुम पत्तों, डालियों और तनेको छोड़कर जड़को ही काट दो। सर्वत्र और सदा श्रीकृष्णको ही पाण्डवोंकी जड़ समझो' ॥ २५ ॥

हन्याद् यदि हि दाशार्हं कर्णो यादवनन्दनम् ।
कृत्स्ना वसुमती राजन् वशे तस्य न संशयः ॥ २६ ॥
राजन्! यदि कर्ण यादवनन्दन श्रीकृष्णको मार डालता, तो यह सारी पृथ्वी उसके वशमें हो जाती, इसमें संशय नहीं है ॥ २६ ॥

यदि हि स निहतः शयीत भूमौ