महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1365, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदुकुलपाण्डवनन्दनो महात्मा । ननु तव वसुधा नरेन्द्र सर्वा सगिरिसमुद्रवना वशं व्रजेत ॥ २७ ॥ नरेन्द्र! यदि यदुकुल और पाण्डवोंको आनन्दित करनेवाले महात्मा श्रीकृष्ण उस शक्तिसे मारे जाकर रणभूमिमें सो जाते, तो पर्वत, समुद्र और वनोंसहित यह सारी पृथ्वी आपके वशमें आ जाती ॥ २७ ॥
सा तु बुद्धिः कृताप्येवं जाग्रति त्रिदशेश्वरे । अप्रमेये हृषीकेशे युद्धकालेऽप्यमुह्यत ॥ २८ ॥ ऐसा निश्चय कर लेनेके बाद भी जब वह युद्धके समय सदा सजग रहनेवाले अप्रमेयस्वरूप देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्णके समीप जाता तो उसपर मोह छा जाता था ॥ २८ ॥
अर्जुनं चापि राधेयात् सदा रक्षति केशवः । न ह्येनमैच्छत् प्रमुखे सौतेः स्थापयितुं रणे ॥ २९ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनको सदा राधानन्दन कर्णसे बचाये रखते थे। उन्होंने रणभूमिमें अर्जुनको सूतपुत्र कर्णके सम्मुख खड़ा करनेकी कभी इच्छा नहीं की ॥ २९ ॥
अन्यांश्चास्मै रथोदारानुपास्थापयदच्युतः । अमोघां तां कथं शक्तिं मोघां कुर्यामिति प्रभो ॥ ३० ॥ प्रभो! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अन्यान्य महारथियोंको कर्णके पास इसलिये भेजा करते थे कि किसी प्रकार उस अमोघ शक्तिको व्यर्थ कर दूँ ॥ ३० ॥
यश्चैवं रक्षते पार्थं कर्णात् कृष्णो महामनाः । आत्मानं स कथं राजन् न रक्षेत् पुरुषोत्तमः ॥ ३१ ॥ राजन्! जो महामनस्वी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण कर्णसे अर्जुनकी इस प्रकार रक्षा करते हैं, वे अपनी रक्षा कैसे नहीं करेंगे? ॥ ३१ ॥
परिचिन्त्य तु पश्यामि चक्रायुधमरिंदमम् । न सोऽस्ति त्रिषु लोकेषु यो जयेत जनार्दनम् ॥ ३२ ॥ मैं भलीभाँति सोच-विचारकर देखता हूँ तो तीनों लोकोंमें कोई ऐसा वीर उपलब्ध नहीं होता, जो शत्रुओंका दमन करनेवाले चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्णको जीत सके ॥ ३२ ॥
ततः कृष्णं महाबाहुं सात्यकिः सत्यविक्रमः । पप्रच्छ रथशार्दूलः कर्णं प्रति महारथः ॥ ३३ ॥ तदनन्तर रथियोंमें सिंहके समान शूरवीर सत्यपराक्रमी महारथी सात्यकिने महाबाहु श्रीकृष्णसे कर्णके विषयमें इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ३३ ॥
अयं च प्रत्ययः कर्णे शक्तिश्चामितविक्रमा ।